दिल्ली की काॅपी-पेस्ट पत्रकारिता ...
एक्जिट पोल के बारे में दो दिन पहले एक विश्लेषणात्मक लेख पढ़ने को मिला। साथी गजेंद्र जी Gajendra Ricky Singh ने अपने फेसबुक पर शेयर किया था एक टिप्पणी के साथ - ‘वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा के आईने से एक्जिट पोल।’ पोस्ट पढ़कर उस अनजान पत्रकार के अध्ययन से प्रभावित हुई। कुछ ही देर के बाद वही पोस्ट राज्यसभा टीवी के लिए काम कर चुके पत्रकार दिलीप खान Dilip Khan के वाॅल पर पढ़ा। पोस्ट पढ़कर शंका हुई तो सवाल जवाब किए। दिलीप खान ने कहा कि उनके पोस्ट इस तरह चोरी होते रहे हैं और अब वह इस पर हैरान नहीं होते।
पत्रकार योगेश मिश्रा ने दिलीप खान के पोस्ट करने के एक घंटे बाद वही पोस्ट किया है इसलिए योगेश मिश्रा पर संदेह किया जा सकता है कि यह उनकी मूल सामग्री नहीं है। योगेश मिश्रा बाकायदा अपने नाम से फेसबुक पेज चलाते हैं, जिसे 6107 लोगों ने लाइक किया है। मतलब उनके पोस्ट इतने यूजर की वाॅल तक पहुंचते हैं। वह Editor in chief Newstrack.com & Apna Bharat हैं। उन्होंने पोस्ट पर न अपना नाम लिखा है न दिलीप खान का। इस एक पोस्ट पर उन्हें 208 लाइक, 71 कमेंट और 72 शेयर मिल चुके हैं। सभी कमेंटों में उनके अध्ययन की तारीफ हुई है और जवाब देने की जगह वह सिर्फ लाइक करते हैं। आप चाहे तो इसे उनकी व्यस्तता भी कह सकते हैं, इस तरह चुप रहकर जवाबदेही से बचा जा सकता है। (पोस्ट का लिंक कमेंट में देखें, दिलीप खान ने सुबह 11ः05 पर पोस्ट किया, योेगेश मिश्रा ने पोस्ट सुबह 11ः49 पर किया है।)
पत्रकार का इस तरह खुलेआम दूसरे के कंटेंट को मूल पोस्ट जताने का तरीका आपको हैरान कर सकता है। लोगों की भावनाओं से खिलबाड़ लग सकता है। लेकिन असल में यह दिल्ली की काॅपी पेस्ट पत्रकारिता है, जिसकी झलक पत्रकारों के पर्सनल स्पेस में लिखे जाने वाले लेखन में भी झलकने लगी है।
इंटरनेट पर खबरें उपलब्ध होने के बाद दिल्ली की पत्रकारिता काॅपी-पेस्ट हो गई है। यहां वेबसाइट और प्रिंट में पत्रकारिता के नाम पर अधिकांश जगह यही हो रहा है। भारत के दूसरे शहरों से रिपोर्टिंग करके दिल्ली आने वाले पत्रकार अपने शुुरूआती दिनों में हैरान और दुख से भरे रहते हैं कि वे इसे पत्रकारिता कहें या चोरी! हर एक शब्द लिखते समय आधार और सबूत का ध्यान रखने वाले पत्रकार जब देखते हैं कि फर्जी अनाप-शनाप लिखा जा रहा है तो माथा पीट लेते हैं।
अगर आपको फीचर स्टोरी पसंद हैं, साहित्य, फिल्म से जुड़ी सामग्री पढ़ते हैं तो जरा उन खबरों या लेखों का ध्यान से अध्ययन कीजिए। ज्यादातर आर्टिकल में दी जा रही सूचना, जानकारी या खबर का सोर्स ही गायब मिलेगा। उदाहरण के लिए- ‘एक रिपोर्ट के मुताबिक..... या एक विशेषज्ञ के हवाले से...’ जैसे वाक्यों को आप हर दूसरे लेख में पढ़ सकते हैं। ये टेबिल स्टोरियां कल्पनाशीलता के आधार पर लिखी जा रही हैं जो कि बहुत खतरनाक स्थिति है। सोर्स न देने के पीछे कारण यह है कि रिपोर्टिंग बंद हो चुकी है, 98 प्रतिशत स्टोरी आइडिया मूल नहीं चोरी के हैं। सभ्य शब्दों में आप इन्हें देश या विदेश की दूसरी भाषाओं की खबरों से प्रेरित स्टोरी कह सकते हैं, जिन्हें इंटरनेट सर्च के माध्यम से बैठे-बैठे लिखा जाता है।
एक और अहम चीज है ‘डेटलाइन’ यानि रिपोर्ट फाइल किए जाने वाले स्थान का नाम जो किसी भी खबर के आरंभ में लिखा होता है। ज्यादातर फीचर स्टोरी में डेटलाइन मिलेगी ही नहीं और अगर होगी भी तो सुविधानुसार। माने.. दिल्ली में बैठकर लिखी स्टोरी मुंबई की बताकर भी प्रकाशित हो सकती है। यानि पाठक को भ्रम होगा कि खबर उस शहर से ही लिखी गई है जहां की घटना या रिपोर्ट है और इसलिए वह उस रिपोर्ट पर यकीन कर लेगा।
बाॅलीवुड की खबरों की बात की जाए तो ये पन्ने बिना किसी सोर्स के बस एंगिलबाजी, काल्पनिकता और काॅपी-पेस्ट के आधार पर रंगे जाते हैं। बाॅलीवुड पर लिखने वाले पत्रकारों में आमधारणा है कि पाठक को यही चाहिए। इस झूठी धारणा को आधार बनाकर मसाला स्टोरी के लिए पाठक को जिम्मेदार ठहराया जाता है। ऐसी फर्जी लफ्फाजी या चोरी के कंटेंट वाली खबरें प्रिंट और वेबसाइट में बिना किसी सोर्स और डेटलाइन या फर्जी डेटलाइन के साथ प्रकाशित हो रही हैं।
साहित्य और फिल्म समीक्षा जैसे काम की बात की जाए तो इनमें पीआर कंपनियों की भी खास भूमिका मिलेगी।उनकी मांग के हिसाब से समीक्षा को प्रभावित किया जा सकता है। अगर ऐसा हर जगह न भी हो, तब भी फिल्म और किताब समीक्षा जैसे महत्वपूर्ण काम पूरी तरह समीक्षक की समझ पर ही टिके है। कारण- मीडिया संस्थान इन कामों के लिए उन पत्रकारों की कोई विशेष वर्कशाॅप तक नहीं कराते। समीक्षक अपने सीमित ज्ञान, हल्की या गहरी विश्लेषण क्षमता और सुविधा के हिसाब से लिख रहे हैं। काॅपी एडिटिंग का काम लगभग समाप्त हो चुका है इसलिए लिखने वाले की जानकारी ही ब्रह्मज्ञान बनकर प्रकाशित हो रही है।
अखबार और वेबसाइटों में छपने वाले यात्रा वृतांत भी बड़े भ्रामक हैं क्योंकि ये यूट्यूब और इंटरनेट की जानकारियों के आधार पर लिखे जा रहे हैं। जबकि इनकी प्रस्तुति पाठक को गुमराह करती है कि जैसे लिखने वाला उस स्थान पर धूमकर आया होगा। मेरा भाई यात्रा वृतांत वाले लेखों की कटिंग रखने का शौकीन है। जब पहली बार यात्रा वृतांत वाले लेखों की सच्चाई जानने को मिली तो अहसास हुआ कि यह उसके जैसे पाठकों के साथ धोखा है। लेकिन धोखा की आधुनिक भाषा में आप इसे चालाकी कह सकते हैं।
राजनीति, अपराध, विदेेश आदि हार्डकोर खबरों में भी कमोवेेश यही हाल है लेकिन इन पर लिखने वाले को मुकद्दमा ठुकने का डर बना रहता है इसलिए कुछ मामलों में सतर्कता बरती जाती है। पर यहां भी डेटलाइन के खेल खूब हो रहे हैं। सोर्स, डेटलाइन और तथ्यों का आधार बताए बिना लिखने का एक बड़ा खतरा यह है कि लिखने वाला अपने व्यक्तिगत स्तर पर अर्जित सामान्य या विलक्षण ज्ञान, विशेष धारणा और राजनीतिक झुकाव के हिसाब से लिखता है। पाठक पत्रकार की सोच से वाकिफ नहीं होता, उसके लिए मीडिया संस्थान ही महत्वपूर्ण है। वह अपने विश्वसनीय अखबार या वेबसाइट पर पत्रकारिता के नियमों का उल्लंघन करके लिखी गईं ऐसी खबरों को पूरी गंभीरता और विश्वास के साथ पढ़ता है और इन खबरों की धारणा में ढलता जाता है। पतन के ऐसे समय में जरुरत हो गई है आम पाठक को ये सच्चाइयां पता चले और किसी भी सामग्री को पढ़ते समय वह शंका से भी उसे जांचें।
टीवी पत्रकारिता के हाल की बहुत जानकारी नहीं है क्योंकि यहां काम नहीं किया है। लेकिन अधिकतर टीवी रिपोर्टर सुबह अखबार की खबरों को पढ़कर अगले दिन उन स्टोरी आइडिया पर काम करते हैं।ऐसे में आप सोचे कि जब अखबारों में ही खबरें नहीं रह गईं है तो उन्हें टीपकर अपना काम करने वाले चैनल किस स्तर की स्टोरी करते होंगे।
इंटरनेट एक खुला मंच है, इसमें सामग्री चोरी को रोकनेे के लिए अभी तक कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हुए हैं।इंतजाम हो भी जाएंगे तो चोर चोरी के नए रास्ते खोज लेगा। यह सब बताने के पीछे कारण यह भी है कि पाठक को पता हो कि एथिक्स किस तरीके से और किस हद तक खत्म हुए हैं। पाठकों को सोचना होगा कि ऐसी काॅपी पेस्ट पत्रकारिता उन्हें क्या लाभ दे रही है? अगर वे चाहते हैं कि पत्रकारिता उनके आम जीवन और सत्ता के बीच की खाई को पाटने का काम करे तो उन्हें पढ़ने के नजरिए में बदलाव करना होगा, सवाल उठाना शुरू करना होगा।
यहां किसी भी तरह की सत्ता से खबरों के प्रभावित होने की बात नहीं लिख रही हूं, वह खुद में एक अलग विषय है जिससे दिल्ली ही नहीं पूरे देश में लिखी जा रही खबरें प्रभावित हैं। इस समय में पत्रकार रवीश कुमार की बात याद आती है कि अगर मीडिया में रिपोर्टिंग नहीं बची तो जो आपतक पहुंच रहा है, वह आपको जागरुक नहीं करता बल्कि विशेष धारणा में कैद करता है। इसलिए ऐसी पत्रकारिता के आधार पर राजनीतिक और सामाजिक धारणा बनाने से परहेज करिए।
- शिवांगी (22 may 2019)

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