मोदी-ममता की समानता और चुनाव क्यों...





आज अंतिम चरण का चुनाव है, इस मौके पर पिछले रविवार का चुनाव चरण याद आ रहा है। दिल्ली ने वोट डालने में उत्साह नहीं दिखाया था। मतदान में कुल साठ फीसद ही वोट पड़े जो 2014 से छह फीसद कम है। उस शाम जब चुनाव के ये आंकड़े आ रहे थे तो एक वरिष्ठ साथी गुस्से से उबल गए। बोले- इन दिल्लीवालों पर तो कोड़े बरसाए जाएं, देश में किसी भी राज्य से ज्यादा फायदे पाते हैं फिर भी वोट देने घर से नहीं निकलते। 
उन साथी का गुस्सा जायज था हालांकि किसी भी तरह की सजा के लिए ऐसा तरीका अपनाने के समर्थक वह खुद भी नहीं होंगे। उसी दिन एक दोस्त पर बहुत गुस्सा हो गई , जब पता लगा कि शहर में होने पर भी वह वोट देने नहीं गईं। उन्होंने कारण दिया कि बीजेपी का प्रत्याशी स्तरीय नहीं था, कांग्रेस या आप को वह वोट नहीं करना चाहती थीं और नोटा करने में उन्हें कोई फायदा नहीं नजर आया। 
जहां पूरे देश की हर लोकसभा सीट पर बीजेपी की ओर से खड़ा एक-एक प्रत्याशी मोदी जी के नाम पर वोट मांग रहा हो, वहीं मोदी से प्रभावित मेरी दोस्त वोट देने नहीं गईं! यहां इस मामले के आधार पर सैंपलिंग करते हुए यह दावा नहीं करूंगी कि पूरे देश में प्रत्याशियों से नाखुश लोग वोट नहीं कर रहे। बहुत सारे लोग बीजेपी को मोदी के नाम पर ही वोट दे रहे हैं। लेकिन मेरी दोस्त के वोट न करने का मामला यह तो बताता ही है कि कई लोग अच्छे प्रत्याशी न उतारे जाने से कितने निराश और नाखुश हैं। दूसरी ओर, वे मानते हैं कि नोटा बटन दबाना कोई उपाय नहीं है जो यह भी बताता है कि नोटा को और मजबूत किए जाने की जरूरत है, क्योंकि बहुत लोग आमतौर पर और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भी नोटा को वोट खराब करना मानते हैं। 
ये कहानियां पत्रकार साथियों की हैं, ऐसे ही एक साथी लखनऊ के हैं जो वोट डालने अपने शहर नहीं पहुंचे। उनसे पूछा तो जवाब मिला कि जब सब मैनेज ही है, ईवीएम की गड़बड़ियों की इतनी खबरें हर चरण में आ रही हैं तो वोट डालने का क्या फायदा! पत्रकारों की ऐसी उदासीनता पर आप चौंक सकते हैं या मेरी तरह गुस्सा हो सकते हैं लेकिन ये बातें इतनी आधारहीन नहीं हैं कि सामान्य मानकार भुलाई जा सके।
उस दिन ही एक और दोस्त से बात हुई। वह पश्चिम बंगाल में अपने गांव का हाल बताना चाहता था। उसके जैसा जिम्मेदार वोट डालने नहीं जा सका, इसका गहरा दुख हुआ। वह खुद भी इस बात से बहुत निराश था। उसके लिए वोट डालना एक हथियार है, जिससे वह ममता बनर्जी के शासन को बदलना चाहता है, इस शासन को वह अलोकतांत्रिक मानता है। एक सीपीएम कार्यकर्ता रहे व्यक्ति का वह बेटा अब मोदी को पसंद करता है, उसे मोदी में ऐसी शख्सियत नजर आती है जो ममता को टक्कर दे सकेगी। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कि मोदी के शासन से असहमत कुछ लोग ममता को मोदी जैसा धाकड़ बताते हैं जो उनसे टकरा सकती हैं। 
खैर, यहां उस दोस्त के बूथ का हाल जानना ज्यादा जरूरी है ताकि आसानी से उपलब्ध वोटिंग अधिकार की अहमियत का अहसास करा जा सके। पश्चिम बंगाल का पूर्वी मिदनापुर जिला ओड़िशा राज्य की सीमा से लगता है, राजधानी से दूर होने के कारण राज्य सरकार के अफसर और योजनाएं यहां नहीं पहुंचीं। वह दोस्त कहता है कि उसके पिछड़े गांव में सिर्फ टीएमसी के गुंडे पहुंचते हैं। रविवार को वहां के बूथ की ईवीएम मशीने पूरी तरह उन्हीं के हवाले थीं। ईवीएम में टीएमसी को छोड़कर बाकी सभी प्रत्याशियों के सामने वाले बटन पर टेप चिपका था! टेप चिपकाने का मकसद साफ था कि उन बटनों को दबाया ही न जा सके। वोट देने के लिए सिर्फ एक बटन उपलब्ध था- तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी के फोटो के सामने वाला बटन...। यह सुनकर पहले यकीन ही नहीं हुआ कि पूरी चुनाव प्रक्रिया के अफसर और पुलिस किस तरह इस हद तक मिले हो सकते हैं। दोस्त ने एक वाक्य में स्थिति बता दी कि पुलिस मोमता की लॉयलिस्ट है। 
दोस्त ने बताया कि उसके घर से सिर्फ पापा वोट देने जा रहे थे। लेकिन पहली बार वोटर बनी उसकी बहन ने साथ जाने की जिद की। दोस्त ने पिता के हवाले से बताया कि बूथ परिसर में टीएमसी कार्यकर्ता धूम रहे थे, जिनका काम यह जांचना था कि कहीं कोई टेप हटाने की कोशिश तो नहीं कर रहा। चुनाव अधिकारियों के पास से होते हुए जब उस दोस्त के पिता ईवीएम तक पहुंचे तो टेप लगे बटनों वाली ईवीएम मशीन देखकर हाल समझ गए। वोट डालने का अभिनय करके बिना बटन दबाए ही निकल आए। उसकी बहन ने भी ऐसा ही किया। मुझे नहीं पता कि बिना वोट डाले स्याही लगी उंगली लेकर घर लौटी उसकी बहन अब क्या सोचती होगी। लेकिन इस घटना पर उन सभी को जरूर सोचना चाहिए जो जिन्होंने जानबूझकर यह अवसर गंवा दिया। 
उस घटना को सुनकर स्वाभाविक प्रश्न था कि पिता ने किसी से शिकायत क्यों नहीं की? उस दोस्त ने कहा कि यहां कोई हंगामा नहीं कर सकता, अपने गांव या देश से पहले सबको अपनी जान की चिंता होती है, यहां खुलेआम तलवारें चलती हैं। बोला कि अगर वह खुद भी वोट देने जाता तो अपने लिए खतरा ही मोल लेता। उसने बताया कि 10-12 साल से यहां हर चुनाव का यही हाल है। कुछ महीने पहले हुए पंचायत चुनाव में कोई विपक्षी प्रत्याशी तक नहीं था, बोला कि यह लोकसभा चुनाव है इसलिए नेशनल पार्टियों के प्रत्याशी खड़े हैं, वरना बंगाल में विपक्ष नहीं बचा। यह भी कम रोचक नहीं कि मोदी को पसंद करने वाला यह दोस्त विपक्ष होने का महत्व जानता है। जबकि मोदी ने पांच साल में लगातार मीडिया व राजनीतिक विपक्ष को खत्म किया हैं। 
उस दोस्त ने बताया कि उसके इलाके के सीपीआई कार्यालय पर कई साल पहले टीएमसी कब्जा कर चुकी है। अब इस पार्टी का वहां कोई अस्तित्व नहीं। उसके पापा को जान बचाने के लिए कई साल ओड़िशा में रहना पड़ा, तब वह हॉस्टल में रहा। उसके पिता में समृद्ध माने जाते थे, इलाके में साख थी अब मछली व्यापार गुंडे हड़प चुके हैं, उसका परिवार रोटी को तरस रहा है। यह कहानी बंगाल के गांवों में हर ऐसे व्यक्ति की है जो टीएमसी का नहीं है। वहां माना जाता है कि जो टीएमसी के साथ नहीं है, वह टीएमसी के खिलाफ है। आप याद कर सकते हैं कि हिन्दी राज्यों में भाजपा से असहमत लोगों को ठीक ऐसे ही भाजपा विरोधी का तमगा दिया जाता है। अब आप सोचिए कि सत्ता किस तरह चुनाव को खेल बना देती हैं और अगर यह खेल पूरे देश में अलग-अलग सत्ता ने अलग-अलग तरीके से किया है तो कितना बदलाव आने की उम्मीद बचती है। 
बाकी देश में जहां लोग लोकतंत्र बचाने के लिए मोदी हटाने की बात कह रहे हैं, वहीं बंगाल में लोकतंत्र बचाने के लिए ममता को हटाने की आवाजें वहीं के लोगों के बीच से दबीजुबान में निकल रही हैं। वह दोस्त कहता है कि बंगाल की नई पीढ़ी अब बीजेपी में उम्मीद खोज रही है। हालांकि वह यह बताना नहीं भूला कि उसके बंगाल में जाति-धर्म कभी चुनावी मुद्दा नहीं था, लेकिन अब फिरकापरस्ती है..माहौल बहुत कड़वा हो गया है। 

उसी दिन फरीदाबाद जिले के एक बूथ में जबरन वोट डलवाने का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें बीजेपी के कार्यकर्ता ने दलित महिलाओं से दबाव बनाकर कमल पर वोट डालवाया। यहां दोबारा चुनाव हो रहा है। उस दोस्त से इस खबर पर भी बात हुई। तब उसने कहा कि अगर बंगाल में भी सही ढंग से रिपोर्टिंग हो पाए तो वहां के हालात बंगाल के बाहर के लोगों को पता चले और गड़बड़ियां पकड़ी जाएं। सातों चरण में वहां भयानक हिंसा की घटनाएं दर्ज की गई हैं। लेकिन इस हिंसा के पैटर्न से आमलोग वाकिफ नहीं। 
कहना पड़ेगा कि देशभर के मतदान केंद्रों पर खूब गड़बड़ियां हुईं हैं जो मामले सामने आ गए, वहां की सच्चाई ही आम लोग जान पाए। मतदान केंद्र पर पोलिंग अफसर को रुपया खिलाकर की जाने वाली फर्जी वोटिंग तो अब भी छिपी हुई है। ऐसी घटनाओं के बीच पहली या दूसरी बार लोकसभा वोट डालने वाली मेरी उम्र की पीढ़ी ने टीएन शेषन का नाम खूब सुना, उनके बारे में पढ़ा और वर्तमान चुनाव आयुक्त पर संदेह किया। अब नई पीढ़ी चुनाव प्रक्रिया पर कितना यकीन कर पाएगी, यह अब एक सवाल बन गया है। साथ ही यह सवाल भी उतने ही महत्व का है कि अगर वोटिंग अधिकार का इस्तेमाल करने के प्रति लोग उदासीन होते जाएंगे, तो व्यवस्था को बदलने के उनके पास कौन से विकल्प शेष बचेंगे? 
हम वोट डाले न डाले, हमारी अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों से कोई न कोई नेता जीतकर संसद पहुंचेगा ही और वे सभी हमारे लिए कानून बनाएंगे। उन कानूनों को हम स्वीकार न भी करें लेकिन वे हमारी जिंदगी पर असर डालेंगे। टूटेफूटे लोकतंत्र की लड़ाई हम न भी समझ पाएं तो कम से कम यह तो समझना ही चाहिए कि इस देश में ही ऐसे बहुत से लोग हैं जो सत्ता की निरंकुशता, जाति-धर्म के भेदभाव के कारण जमीनी स्तर पर इस हक से महरूम रह जाते हैं। साथ ही इस बात का भी अध्ययन करें कि विरोधी विचारधारा के दो कद्दवर नेता अलोकतांत्रिक शासन के मामले में कितने समान हैं।
अब मतदाता जागरुकता पर लिखना वैसे तो सांप निकलने के बाद लकीर पीटने जैसा ही है। लेकिन हिंदुस्तान इतना बड़ा है कि यहां हर साल किसी न किसी इलाके में कोई न कोई चुनाव होता है, हम अगर जागरूक होंगे तो अगले किसी अवसर पर अपने हक के प्रति इतना उदासीन नहीं दिखेंगे।
- शिवांगी (19 may 2019)

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