गुलाबी डिब्बे की औरतें ...
मैं गुलाबी को लड़कियों का रंग कहे जाने का तर्क आज तक नहीं समझी। इसलिए इस रंग की चीज़ें लेने से बचती हूँ। पर मेट्रो का गुलाबी डिब्बा हर बार लुभाता है। हालांकि मुझे यक़ीन है कि यह डिब्बा हम औरतों का अपना स्पेस सोचकर नहीं बल्कि सुरक्षा की सोच से बनाया गया होगा। पर इस डिब्बे में सफर करना कई अहसासों से भरा है।
मैंने सुबह 8-9 बजे या इससे जल्दी कभी किसी बस/ट्रेन में सफर करतीं इतनी ज्यादा औरतें एक साथ नहीं देखीं। सुबह बच्चों को स्कूल या आदमी को काम पर भेजने वाली गृहस्थतनें टहलने भी कहां जा पाती हैं। बस तेज-तेज डग भरती मेहरी ज़रूर निकलती दिखती हैं रास्तों पर।
मगर मेट्रो के इस गुलाबी डिब्बे की सुबह भी बड़ी गुलाबी है। अपनी-अपनी तरह सजी-धजी, अपने पर्स में खूब सारा सामान ठूंसे, एक जूठ के बैग में टिफिन रखे या अपने कंधे पर तनी वाला टिफिन लटकाए इस तेज रफ्तार गाड़ी में अपना संतुलन बनाये खड़ी दिखती हैं वर्किंग वीमेन। लोग झूठ कहते हैं कि चार औरतें पास खड़ी हों तो चुप नहीं रह सकतीं। मैंने तो ऐसी भीड़ वाले डिब्बे में भी सन्नाटा महसूस किया है। पर हां, सबके साथी फोन और ईयर फोन हैं। मुझे ये भीड़ अलग दुनियां में ले जाती है एक पल के लिए। वो दुनिया जहां औरतें ऐसे ही अपने बल खड़ी सफर करें, अपने मन का पहनें और अपनी सहूलियत के मुताबिक समय पर घूमें।
पर 'जब-जब कृपया दरवाजे से दूर खड़े हों' की घोषणा के साथ गेट खुलता है, अंदर घुसने वाली औरतें अपने साथ किसी आदमी की पहचान लिए खड़ी नज़र आती हैं! खूबसूरती और आत्मविश्वास भरे चेहरे वाली इन औरतों के खुले रेशमी बालों के बीच कहीं दिखता है लाल रंग। माथे पर बिंदी न भी हो पर ऊंची जीन्स या स्कर्ट पहनी ये औरतें बिछुआ नहीं छोड़ पायी हैं! डीप नेक के टॉप पर गले में लटका दिखता है कुछ स्टाइलिश सा मंगलसूत्र भी। हर कोई मोबाइलों पर खोले बैठीं होती हैं फेसबुक या ट्विटर। उनके नाम के आगे जुड़ा साफ दिखता है पति का नाम! शालिनी जी ठीक कहती हैं कि अब तक हम सरनेम के बोझ से दबी थीं, अब नए सिरफिरे फैशन में पति का नाम भी जोड़ लिया है साथ में।
बड़े शहर की औरतें भी संस्कारों की दुहाइओं की मारी हैं। कई से तो घुमाफिरा कर मैंने पूछा कि सिंदूर, बिंदी नहीं लगातीं फिर ये मंगलसूत्र और बिछुआ क्यों? जवाब है कि लोग क्या कहेंगे। कुछ इन चीजों को पति से प्रेम बताती हैं। पर पति उनके प्रेम की ऐसी कोई पहचान क्यों नहीं ओढ़ता? का जवाब सिर्फ हंसी में है इनके पास! मैं निराश हूँ, घर और बाहर काम करके दुगुना श्रम करने वाली हम औरतें सामाजिक बंधनों को सिर्फ कम्फर्ट के हिसाब से तोड़ रही हैं। और मुगालते में हैं कि सशक्त हो रही हैं।
वे नहीं समझतीं कि किसी विशेष रंग, पहनावे, हेयर स्टाइल, विशेष चाल- हावभाव को जेंडर में बांटना ही है पुरुषवादी सत्ता। ये तरीके ही एक परिधि तय कर देते हैं जिन्हें संस्कार की शब्दावली में 'सीमा' कहा गया है। इस परिधि को तोड़ना निषेध है। हम सब इस सीमा को बिना सोचे समझे अपना चुकी हैं। जैसे इस पर सवाल खड़े करना, अपनी संस्कृति पर सवाल खड़े करना हो। फिर ये परिधि ही बताती है कि लाल रंग औरत, गुलाबी लड़की और नीला पुरुष के लिए होता है। ये परिधि ही किचिन को औरतों की हद और बाजार को आदमी की जागीर बना देती है। पर हम कहां समझने वाली हैं।
shivangi (7 may 2018 )


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