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एक माह बाद आज .....

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                बची-खुचीं उम्मीदों को भी आज सरकारी क़फन में दफन कर दिया जाएगा। आखिर डूब ही जाएंगे  आशा के अधबुझे दीप भी आज उस जलजले के बाद  आंखों में रोज आ उठती भयानक बाढ़ में। हर रोज तुम्हारे जिंदा होने की मुर्दा होती मुरादों  जुबां से निकलने को तैयार न होते अंदेशों के बीच आज पूरी तरह से खो चुकी होऊंगी मैं तुम्हें। ..और तुम्हारे इस अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों की जगह मुआवजे के कुछ सरकारी पैसे  रख दिये जाएंगे मेरे हाथों पर..!! उस विनाश लीला के एक माह बाद आज, पूरी तरह से बंजर और अकेला हो जाऊंगा मैं जिंदगी भर के लिए। उस तूफान में अपनी पीढ़ियों को  अचानक समाहित होते देखने का वो भयावह मंजर अब किसी रोज मेरे अंतिम दिन का कारण बनेगा।  पर कोई शेष न होगा मुझे मुखाग्नि देने के लिए भी। तब मेरे बच्चों,  कहीं किसी पहाड़ी पर  चील कौवे की नोंची तुम्हारी लाशों के बदले  मिली मुआवजे की रकम से ही शायद मुझे इंतजाम करना पड़ेगा.. खुद ही अपने अंतिम संस्कार का।   अब सकट, राखी और करवाचौथ पर,...