एक माह बाद आज .....

 
 
 
 
 
 
 
 
बची-खुचीं उम्मीदों को भी आज
सरकारी क़फन में दफन कर दिया जाएगा।
आखिर डूब ही जाएंगे 
आशा के अधबुझे दीप भी आज
उस जलजले के बाद 
आंखों में रोज आ उठती भयानक बाढ़ में।

हर रोज तुम्हारे जिंदा होने की मुर्दा होती मुरादों 
जुबां से निकलने को तैयार न होते अंदेशों के बीच
आज पूरी तरह से खो चुकी होऊंगी मैं तुम्हें।
..और तुम्हारे इस अंतिम संस्कार के बाद
अस्थियों की जगह मुआवजे के कुछ सरकारी पैसे
 रख दिये जाएंगे मेरे हाथों पर..!!

उस विनाश लीला के एक माह बाद आज,
पूरी तरह से बंजर और अकेला हो जाऊंगा मैं जिंदगी भर के लिए।
उस तूफान में अपनी पीढ़ियों को 
अचानक समाहित होते देखने का वो भयावह मंजर
अब किसी रोज मेरे अंतिम दिन का कारण बनेगा। 
पर कोई शेष न होगा मुझे मुखाग्नि देने के लिए भी।
तब मेरे बच्चों, 
कहीं किसी पहाड़ी पर 
चील कौवे की नोंची तुम्हारी लाशों के बदले 
मिली मुआवजे की रकम से ही शायद
मुझे इंतजाम करना पड़ेगा..
खुद ही अपने अंतिम संस्कार का।  

अब सकट, राखी और करवाचौथ पर,
आंखों की नमी में, हलक में अटके कुछ शब्दों में,
भारतीय सेना के फौलादी जज्बों में
खानापूरी करते सरकारी राहत इंतजामों में 
और मुआवजे के रुपयों में...
उसी मंजर को ताजा करने आ जाया करोगे हमारे जहन में तुम
धरती के ब्रह्मलोक और बैकुंठ ...केदारनाथ!!
- शिवांगी - 16-7-2013 

(इस साल केदारनाथ में बाढ़ के रुप में आए प्रकृति के इस कहर ने उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश को हिलाकर रख दिया। १६जून को आई बाढ़ के ठीक एक माह बाद तमाम लापता हुए लोगों को मृत घोषित करने व सरकारी मुआवजा मुहैया कराये जाने पर इन तमाम बाढ़ से प्रभावित हुए लोगों की मानोदशा को समझने की मेरी एक कोशिश थी। मृत घोषित करना, मुआवजा मिलना कायदे में व्यवहारिक है लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर इनका असर उम्मीदों पर पूर्णविराम लगाने जैसा है। हालांकि कविता लिखने के अगले दिन अखबार से पता लगा कि सरकार नें इन्हें मृत नहीं ‘स्थायी लापता’ घोषित किया तो थोड़ी संतुष्टि हुई। साल के आखिरी दिन केदारनाथ के इस तांडव में लुप्त हुए लोगों और उनके कुछ बच चुके परिजनों को आप सब के साथ मिलकर याद करना चाहूंगी।)

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