औरत का अस्तित्व क्यूँ बस इज्ज़त भर ......

तुम्हे देखके ऐसा लगा कि कोई गांव की औरत सर ढांके बैठी हो....! पास बैठी एक लड़की पर ये तंज सुन जाहिर तौर पर सबकी तरह प्रतिक्रिया दी मैंने भी। मगर फिर एक ने कहा कि क्या तुम्हारी मां-बहन पर्दा नहीं करती?! (लगा कि पर्दा जैसे कथित इज्जत का सर्वमान्य परिचायक हो)..। बात यहां तक भी ठहरती तो ठीक था... 'सर क्या आपकी मां-बहन मिनी स्कर्ट में रहती हैं?'.... लड़की का कसैला सवाल... सुनने बालों में से कुछ नें मन में तो कुछ ने मुंह पर बोला...'बहुत अच्छे'।वो व्यक्ति खुद की खिल्ली पर चुप था...और वो लड़की अब बराबरी पर संतुष्ट दिखी। ...बात यहीं खत्म हो जाती तो क्या बात थी।
अचानक छोटी बहन के पहले दिन डिग्री कालेज जानें का अनुभव याद आया....।
'अपनी मां-बहन को घर भेजना, मेरा भाई अच्छी सेवा करेगा उसकी...' उसने साइकिल से वापस आते समय एक लड़के को जवाब देते हुए बोला था। लड़के ने छेड़ते हुए सेवा का मौका देने की बात कही थी उसे । मैंने सुना तो डांटा उसे... बोली घर में तो सबनें मुझे 'वेरी गुड...ब्रेव गर्ल कहा'.. फिर आप इसे गलत क्यूं कह रही हो?!...
छोटी बहन और वो लड़की अपनी जगह ठीक ही हैं शायद। शतकों से मां-बहन बस एक दूसरे की इज्जत उछालनें के काम ही तो आई हैं! उनका अस्तित्व हम अलग देखते ही कब हैं...बाप..भाई..पति की इज्जत भर ही तो है इनका जीवन...।
मेरा सवाल सिर्फ इतना था कि क्यों उस लड़के और उस व्यक्ति को जवाब देंने के लिए दोनों लड़कियों ने अपनी ही कौम का अंजाने ही इस्तेमाल कर किया? ...छोटी बहन को तो ये समझा पायी लेकिन उस लड़की और कितने ही दूसरे लोगों को समझा पाना मुश्किल है ये....

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