सनकी दुनिया




आज़ादी की छटपटहट ...... ( पेंटर शिबली की ये पेंटिंग खरीद पाना मुश्किल था सो फोटो ही ले पायी)

 ज़िंदगी सनक है ...एक ज़िद भी,
जिसे घर में मक्कारी कहते हैं।
बागीपन खून में नहीं होता ,
रिश्तों में विश्वास का घटा प्रतिशत,
चुपके से बना जाता है बागी ॥

जब बदलती सोच,
छितरा देती है परिवार से।
लक्ष्य हो जाते जीने का मात्र कारण।
स्वार्थी सुनना आम सा लगता,
ज़िंदगी बेचैन लेकिन स्थिर होती है तब॥

कविताओं से गायब होता रस,
सपनों में आती हक की लड़ाई ...
तब पागलपन लगती ज़िंदगी,
परम्पराओं से उचटा मन,
चुप्पी साधना समझता बेहतर॥

सनकी दुनिया की बेचैन ख्वाहिशे,
दूसरों से सिकुड़ खुद में फैलता जीवन,
अपनी ही दुनिया होती तब।
ऐसी सनकी दुनिया जिसका वास्ता ,
नहीं करना चाहती तुमसे कभी ॥
                    - शिवांगी (29/08/2015)

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