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जींस वाली लड़कियां

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मैं अच्छी तरह परिचित हूं इनसे.. सरपट दौड़तीं, उससे तेज खिलखिलातीं साड़ी और सलवार सूट देख मुंह बिचकातीं स्कर्ट पहनने की चाह दबाए एक ही रंग की कई जींस खरीद लाती हैं। हिंदुस्तानी मध्यवर्ग जैसी तो हैं। बड़ा बनने की तमन्ना मन में लिए, खुले कपड़ों को बस ताकती रहतीं है। गर्मियों में जींस जब काटती हैं तब बहुत लानत भेजतीं अपनी सनक पर। सुना है मजदूरों का पहनावा थी जींस एक फिल्म में देखा- 'जींस का हक, जीने का हक।' पापा कहते 'सभ्य पहनावा' टांगे नहीं दिखती लड़कियों की। अब देती है घूंघट सी घुटन। ऐसी जींस अब लगती बंधन आसपास अपने जैसियों को  टखने-घुटने से फटी डिजायन वाली जींस पहने देखकर जाने क्यों लगता है डिजायनर बुर्का पहनी हों। - शिवांगी, 11.फरवरी. 2018

महतारी

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मांएं अजीब हैं लक्ष्मी पैदा होने पर  अफसोस करतीं।  आम सी सूरत निखारने को घिटती रहतीं चेहरा। खिसियातीं सोचकर खसम कैसे करेगा इकट्ठा मोटा जहेज। गुस्से में कोसतीं पूछतीं.. क्यों नहीं तू मेरे जितनी चिट्टी? आदमी गुस्से में मारता लल्ली पोंछती आंसू। मां फिर रोतीं सोचतीं.. उसके चले जाने पर कौन बचाएगा मार से। ये भी मनातीं दामाद न हो आदमी जैसा। चौका बासन न करे तो जमातीं बेलन। नौकरी सुन पूछतीं कौन आदमी रखेगा। मोटे जहेज साथ आखिर मिल ही जाता अच्छा लड़का। लल्ली विदा होती मांएं दहाड़े मारकर रोतीं।   कहतीं.. शरीर का हिस्सा कट गया। कोई नहीं समझ पाता उनका रुदन। फिर पति संग जा गंगा नहा आतीं। बोझ उतर जाता मन का। अब पूरे जीवन आदमी और लड़के से नज़र बचा जुटाएंगी रुपया लल्ली की त्योहारी को।। - शिवांगी 17 जुलाई 2018

दोस्ती को दोस्ती रहने दो ...

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मार्केट और मीडिया में दिवसों को इतना बेचा जाता है कि फ्रेंडशिप डे या किसी और डे पर एक-दूसरे को विश करना अब हास्यास्पद लगता है। इसलिए मैंने किसी को विश नहीं किया। पर कुछ घंटे पहले छोटी बहन(प्राची) का कॉल आया, बोली- हैप्पी फ्रेंडशिप डे दीदी। मैंने कहा, हां यार आज फ्रेंडशिप डे है। बोली, 'तुमने एक बार कहा था कि रिश्ते खत्म हो जाते हैं और दोस्ती चलती रहती है, इसलिए मैं तुम्हें विश कर रही हूं।' जाहिर है किसी को भी यह सुनना अच्छा लगता, मुझे भी लगा। पर उसकी कॉल के बाद से बहुत कुछ दिम ाग में चल रहा है। बीते एक साल की ही बात करूं तो मैं आज कह सकती हूं कि हर रिश्ते की परिणति खत्म हो जाना है और दोस्ती वाले रिश्ते भी उस तरह ही खोखले होने के बाद खत्म हो रहे हैं। आज मैं गिनूं तो लंबी फेहरिस्त में सिर्फ दो दोस्त हैं जिन्हें मैं सच में दोस्त कह सकती हूं, जो वाकई निस्वार्थ रहे हैं अब तक। पर यह भी सच है कि मुझे नहीं पता कि अगले साल मैं यह कह पाऊंगी या नहीं। ऐसा क्यों है? ... इस पर अलग-अलग मत हो सकते हैं। कोई कह सकता है मेरा ही व्यवहार अच्छा नहीं या कुछ और भी। मैं आज यह इसलिए लिख रही हूं कि मैं ...

'छोटा शहर'

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वो आखिरकार उड़ गई.. उसे तो जाना ही था। बदलाव की चाहत, या उकताहट दिखती थी शहर के लिए उसमें। वो शहर से परेशान हुई या सुधारने की कोशिश में सबको, शहर ने उसे परेशान कर दिया?§ यह सवाल आजकल चर्चा में है।। यूं तो सब शहर एक से हैं पर कुंठित जीवन जीते हैं छोटे शहर के लोग। यहां की चुनौतियां अजब हैं लड़कियों के लिए, उनकी शर्त पर नौकरी, पहनना, ओड़ना, बतियाना और सोना, सबकी नियमावली होते हैं छोटे शहर। हरदम कुचलने को तैयार छोटे शहर बड़े शहर जाती लड़कियों के लिए, अचानक आशंकित हो उठते हैं पर वो चली जाती हैं बिना सुनें। शहर में मंथन चलता रहता है,  उनके हर सही को गलत ठहराने का। वो क्यों बताएं...  इन शहरों की बुराइयां ही पैदा करती गईं उसमें संबल जूझने का। तुम्हारे पास जवाब होंगे संबंधों का संसार है छोटा शहर। पर सिर्फ जन्म के साथ मिले संबंधों का। तुम कहोगे.. किसका जिक्र किया? मैं कहूंगी.. बस यही तो है छोटे शहर का एकमात्र सवाल।। - शिवांगी (15, जुलाई, 2016)