मास्टरबेशन से ऑर्गेज्म तक....


पुरुष सेक्स के लिए प्यार करता है और औरत प्यार के लिए सेक्स करती है - ख़ुशवंत सिंह (किताब -औरतें, सेक्स ,लव और लस्ट)
पहली नजर में अमूमन महिलाओं और पुरुषों को यह वाक्य सही लगेगा। पर जवाब यह भी हो सकता है -
'' aurat ko pyar ke liye sex karna sikhaya jata hai... Condition kiya jata hai.. kartvya karar diya jata hai... Warna wo sex ke liye sex kare ... Pyar ke liye sex zaruri nahi.. sex kisi se bhi kiya ja sakta hai.. uske liye pyar koi anivarya element nahi. Purush sex ke liye pyar ka swang hi isliye karta hai ki wo aurat ko bandh sake ... Taki wo apni sex ki chah ke liye premi par hi nirbhar rahe.''
फेसबुक के एक ग्रुप में चली चर्चा में यह मेरा जवाब था। आभासी लाइक-कमेंट के बाद इसी विषय पर एक साथी से बात होने लगी। वह बोलीं- यह वाक्य पढ़कर वे भावुक हो गईं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में असहमति जताई, जो अच्छा ही था.. क्योंकि सहमति जतातीं तब शायद हम इस बात पर इतनी बात न करते और नए निष्कर्ष तक न पहुंचते।
भारत में लड़कियों को यौन हिंसा के बारे में तो बहुत जानकारी है, क्योंकि वे अपने घर, ससुराल और समाज में हर दिन ये घटनाएं देखती हैं। पर यौन सुख या सेक्सुअल प्लेजर को लेकर उनमें कोई समझ विकसित नहीं हो सकी है, या यूं कहें कि पितृसत्तात्मक समाज ने यह समझ उनमें विकसित नहीं होने दी। इस सोच से ग्रस्त राजनेता भी स्कूल में सेक्स एजुकेशन को शामिल नहीं होने दे रहे। उन्हें यह संस्कृति के खिलाफ लगता है, जबकि कामसुत्र नामक शास्त्र यही लिखा गया!
मुझे याद आ रहा है दो महीने पहले एक बातचीत के दौरान अपनी दो बहनों से मैंने पूछा कि क्या वो मास्टरबेट करती हैं? दोनों में एक मेरी उम्र की और दूसरी मुझसे करीब सात साल छोटी है, यानी मुझसे अगली जेनरेशन की एडवांस कही जा सकने वाली लड़की। लेकिन मेरे सवाल पर दोनों ने पलटकर पूछा, 'क्या ..ये क्या होता है?' उनकी प्रतिक्रिया के बाद मुझे समझ में आया कि फिल्म वीरे दी वेडिंग के मास्टरबेशन सीन को लेकर इतना बवाल क्यों हुआ था। उंगलियों के पोरों से ब्राउज होने वाली दुनिया में रह रहीं हम लड़कियां आज भी मास्टरबेशन नहीं जानतीं। जबकि इसी दुनिया में वो लड़कियां भी हैं जो दिन में एक बार जरूर अपने सुख के लिए यह करती हैं। लड़कों के लिए तो यह उनके दैनिक जीवन का अंग है। ऐसी लड़कियां भी हैं जो सेक्स ट्वायज का इस्तेमाल करती हैं, क्योंकि भारत में लड़कियों के लिए शारीरिक सुख बहुत आसानी से उपलब्ध नहीं होता।
कुछ दिन पहले मेरी एक अन्य साथी ने एक वाक्य बताया था - ''अगर ऑगेज्म तक पहुंचे बिना महिलाएं गर्भ धारण नहीं कर सकतीं तो आज दुनिया की आबादी आधी भी न होती।'' यह बात कितनी सच है न, क्योंकि भारत में बड़ी तादाद में ऐसी महिलाएं हैं जो जीवन भर में एक बार भी यौन सुख की चरमसीमा का अनुभव नहीं कर पाती, जिसे  ऑर्गेज्म कहते हैं। इस मुद्दे पर कभी कोई महिला खुलकर बात नहीं करती, पति के प्रेम के आगे उसकी 'परफार्मेंस' उनके लिए मायने नहीं रखती। सेक्स के दौरान उसकी क्या इच्छाएं थीं, यह कभी वह अपने पर भी ज़ाहिर नहीं होने देती। बल्कि कहे तो सेक्स वो कभी अपने सुख के लिए करती ही नहीं है। ज्यादातर समय महिलाओं के लिए सेक्स करने की वजह काम से थाकेहारे पति को 'सुख' देकर उसकी थकन उतारना होता है। हो भी क्यों न, आखिर उन्हें शुरुआत से इस बात के लिए अनुकूलित किया जाता है कि यह उनका कर्तव्य है, पति चाहे कुछ मिनट में ही निपटकर पीठ करके लेट जाए.. वे कहां कुछ कह पाती हैं। महिलाओं की बातचीत का बड़ा आम वाक्य है- ''हम चाहे खुद को कितना भी बराबर मान लें..रात में तो नीचे ही लेटना होगा!'' असल में उन्हें सिखाया गया है कि वे सेक्स में पैसिव पार्टिसिपेंट हैं, उन्हें सिर्फ की जा रही पहल की प्रतिक्रिया में चुप हामी भरनी है। सेक्स में नई कलाएं या प्रयोग कभी उनके दिमाग में नहीं आते, इसलिए सेक्स को इंज्वाय करना उन्हें नहीं आता। अगर वे ऐसी कोशिश करती भी हैं तो चरित्र का सवाल खड़ा हो जाता है। पति को लगने लगता है कि हो न हो उसकी औरत 'अनुभवी' है।
बात तो इसपर भी होनी चाहिए कि किसी एक ही व्यक्ति के साथ अपना शरीर बांटने की अजीब सीख का क्या मतलब है। ..और इस पर भी कि औरत के पूर्व या समानांतर रिश्तों पर क्यों सवाल उठना चाहिए, जबकि पुरुष के संदर्भ में विवाहेतर संबंध एक सच्चाई है। मुद्दे कई हैं, जिनपर बात हो तो रिश्तों की जकड़न कम होगी और महिलाएं मानसिक और शारीरिक रूप से ज्यादा स्फूर्तिमय होंगी, रोना भर उनकी किस्मत न होगा। पुरुष साथी भी इस मुद्दे को पढ़कर अपनी साथी से बात करेंगे तो उन्हें उस महिला की दबी भावनाओं का आभास होगा।
ऑगेज्म तक पहुंचने के लिए आत्मसुख के तरीके मास्टरबेशन के बारे में जानने और अनुभव करने से शुरुआत की जा सकती है। यौन इच्छाएं उम्र की मोहताज नहीं होती, न बच्चे पैदा करने भर का होता है इनका मकसद। अपने शरीर के प्रति जागरुक बनें और इच्छाओं को दबाने की जगह उन्हें सबसे पहले खुद से साझा करें। ये स्थितियां तब बदलेंगी जब इस पर हम बात शुरू करेंगी, आज मैं शुरुआत कर रही हूं, आप भी करिए। 

originally posted on facebook (24 august 2018)

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