महतारी

मांएं अजीब हैं
लक्ष्मी पैदा होने पर 
अफसोस करतीं। 
आम सी सूरत
निखारने को घिटती
रहतीं चेहरा।
खिसियातीं
सोचकर खसम
कैसे करेगा
इकट्ठा
मोटा जहेज।
गुस्से में कोसतीं
पूछतीं..
क्यों नहीं तू
मेरे जितनी
चिट्टी?
आदमी गुस्से में
मारता
लल्ली पोंछती आंसू।
मां फिर रोतीं
सोचतीं..
उसके चले जाने पर
कौन बचाएगा मार से।
ये भी मनातीं
दामाद न हो
आदमी जैसा।
चौका बासन
न करे तो
जमातीं बेलन।
नौकरी
सुन पूछतीं
कौन आदमी रखेगा।

मोटे जहेज
साथ
आखिर मिल ही जाता
अच्छा लड़का।
लल्ली विदा होती
मांएं दहाड़े मारकर रोतीं। 
कहतीं..
शरीर का हिस्सा
कट गया।
कोई नहीं समझ पाता
उनका रुदन।
फिर पति संग जा
गंगा नहा आतीं।
बोझ उतर जाता
मन का।
अब पूरे जीवन
आदमी और लड़के
से नज़र बचा
जुटाएंगी रुपया
लल्ली की त्योहारी को।।
- शिवांगी 17 जुलाई 2018

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