'लड़कियां' ...उनकी नजर में


 
आज कुछ कुल्टाए मिली,
कुछ चरित्रहीन भौंड़ी सी लड़कियां भी।
अतिविश्वास की मारी घूम रही थी,
सड़क बाजार के अलावा भी कई जगह।
मैंने बस नजर उठाकर देखा भर,
और अपनी औकात बता दी इन्हें।
अब सिर्फ टीचर नहीं रह गई हैं ये,
दफ्तरों के रिसेप्शन से
सीईओ की कुर्सी तक काबिज़ है।
जब भी मिलता हूँ तो पहले चरित्र नापता हूँ,
बड़े ओहदे वालियों की मुस्कानों में,
छिपा देखता हूँ वो रास्ता जिससे यहां तक पहुंची होंगी।
खुद की क्षमता का डंका ,
पीटने में भले माहिर होती हैं ये।
लेकिन जानता हूँ मैं,
हमारी सेवा बिना कहां पहुंचने वाली हैं ये कहीं।
हर रोज ऐसी ही कहानियां भरता हूँ,
माँ और बहन के कानों में,
ताकि चेता सकूं कि 'घर में ही बैठो' ।।
- शिवांगी (15/07/15)

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