एक दिन का मतदान अधिकारी .....
कभी अजीब बेचैनी का दौर होता है जब आप कुछ बताना चाहे और लायक शब्द न मिले। एक सप्ताह से कुछ लिखना चाह रही हूं, पर जो सुना था उन भाव को शब्दों में नहीं ढाल पा रही। कुछ ऐसी ही बैचेनी एक दोस्त के साथ भी थी पिछले सप्ताह। वह मिर्जापुर में किसी मतदान केंद्र पर चुनाव कराकर लौटा था पीओ-1 या प्रथम मतदान अधिकारी की हैसियत से। फोन उठाते ही उसकी तरफ से आवाज आई, ‘न्यूटन देखी है तूने?’
चुनाव के बाद लोग लहर या किसी अंडर करंट के बारे में पूछते-बताते हैं। लेकिन उसका सवाल एकदम अलग था। ‘नही’ ... का जवाब मिलने पर वह कुछ उलझ गया। कुछ रुककर उसने कहा, ‘अगर यह फिल्म देखी होती तो आज बड़ी आसानी से समझ पाती कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूं।’
उसके कैसा महसूस करने की कहानी चुनाव प्रक्रिया से जुड़े हर शख्स की कहानी हो सकती है।
उसकी यह कहानी चुनाव प्रशिक्षण से शुरू होती है। उसने बताया- चुनाव आयोग ने पोलिंग पार्टी के सदस्यों की महीने भर ट्रेनिंग कराई थी। उन्हें चुनाव अधिकारी के अधिकार, आचार संहिता, ईवीएम की पूरी प्रक्रिया और लोकतंत्र में चुनाव की जरूरत के विचारों से पूरी तरह भर दिया था। दोस्त बोला, ‘तब तो ऐसा महसूस होता था कि बस पोलिंग डे आए और हम झंडे गाड़ दें।’ पर असल हालात अक्सर अलग होते हैं। उस दोस्त के लिए सरकारी नियमों का भ्रम टूटने का पहला अनुभव पोलिंग पार्टी की रवानगी के इंतजाम के रूप में हुआ। जब चार सौ किलोमीटर दूरी के सफर में उस दल को ट्रक में लादकर मिर्जापुर भेजा गया। बताए गए इंतजाम और वास्तविकता के अंतर के आधार पर उसका दावा है कि हर जिले का डीएम चुनाव के समय कम से कम एक करोड़ रुपया अपनी जेब में भरता होगा। आने- जाने से लेकर ठहरने खाने तक का इंतजाम प्रमाण था उसके लिए।
खैर, रात गई बात गई। अगली सुबह वही थी जिसका उसे इंतजार था। उसने एक बात कही कि चुनाव की उस सुबह बस उसके दिमाग में एक ही बात थी - ‘मेरे पास अधिकार है कि मैं जब तक किसी का वोटिंग लिस्ट में नाम और पहचान पत्र देखकर संतुष्ठ न हो जाऊं, तब तक वह वोटर मेरे बाद के पोलिंग अफसरों से गुजरकर ईवीएम तक नहीं पहुंच सकता।’ उसने बस पूरे दिन यही किया। उस दोस्त ने दिनभर में हुई तमाम घटनाओं के बारे में बताया, जिनमें फर्जी वोट डालने आए लोगों को उसने शालीन लहजे में डपटकर बाहर का रास्ता दिखा दिया। गांव के कुछ धाकड़ जब नहीं माने तो पुलिस की मदद ले ली।
उसने इस प्रक्रिया की एक दिक्कत का भी जिक्र किया कि वह चाहता तो फर्जी मतदान की कोशिश करने वालों पर मुकदमा भी करा सकता था। लेकिन यह पूरा प्रोसेस बहुत लंबा और कागजी था इसलिए वह इससे दूर ही रहा। दोस्त बोला, इस सब के दौरान कई बार साथी हल्के से मजाक उड़ा देते- ‘लगता है आप पहली बार चुनाव करा रहे हैं।’
शाम होते-होते बूथ का माहौल बदलने लगा। दो पोलिंग एजेंट पर्चियां लेकर उसके पास आए और बोले, ‘सरजी, इन पर्चियों के वोट और पड़ेंगे।’ दोस्त ने घड़ी देखी, तब छह बजने में दस मिनट बाकी थे। उसने संख्यावार पर्चियां उन्हें थमाईं और कहा कि लाइन में लगे लोगों को ये पर्चियां दीजिए, छह बजे तक जो भी इन पर्चियों के साथ लाइन में लगे होंगे उन्हें वोट डालने दिया जाएगा। पर असल में मामला लाइन में लगे वोटरों से जुड़ा नहीं था। दो मुख्य दलों के वे पोलिंग एजेंट इस भोले अफसर से आखिर सीधे बोल उठे, ‘2500-2500 में हम दोनों बीस-बीस वोट डाल लेंगे सरजी?’
दोस्त उस नजारे को बताते- बताते एकदम हंसा फिर बड़ी झल्लाहट से बोला, ‘ वो मुझे रिश्वत दे रहे थे! मैंने उन्हें नरमी से कहा कि देखिए मेरे साथ यह सब सेटिंगबाजी नहीं चलेगी।’ इस पर उन एजेंटों ने तुरंत दाम बढ़ा दिए। यह सुनकर अबकी हम दोनों हंसे। एजेंटों से शायद ठीक समझा था, हिंदुस्तान में अब यह आम हो चला है कि जब कोई रिश्वत लेने से मना करे तो माना जाए कि वह पेशकश की कीमत बढ़वाना चाहता है। खैर, इस खरीदफरोख्त का फेल होना तय था, उस पोलिंग बूथ पर जब प्रथम मतदान अधिकारी ने सख्ती कर दी थी तो द्वितीय, तृतीय चुनाव अधिकारी चाहकर भी कोई ऐसा काम नहीं कर सकते थे।
उस भोले दिख रहे अफसर के दिमाग में इस घटना ने तुरंत शंका पैदा की। वह दूसरे कमरों में देखने पहुंचा कि कही वहां ऐसी सौदेबाजी तो नहीं चल रही। उस दोस्त का कहना है कि उन सभी कमरों में लगातार ईवीएम से बीप की आवाज आ रही थी। पोलिंग एजेंट मिलकर अपने-अपने प्रत्याशियों के नाम पर बटन दबा रहे थे। वहां वे सभी मौजूद थे जो चुनाव प्रक्रिया में होने चाहिए, सिवाय मतदाता के।उसने एक बात और कही, पोलिंग एजेंट बनाए गए लोग उस गांव-कस्बे के ही होते हैं, इसलिए वे अच्छी तरह जानते हैं कि जिन पार्चियों पर वोट नहीं पड़े, उनमें कौन मर चुके हैं या कौन बाहर रहते हैं? ऐसे में फर्जी वोटिंग का मामला खुलने की संभावनाएं भी वे नहीं छोड़ते और बहुत ध्यान से पर्चियों का इस्तेमाल करते हैं।
दोस्त ने कहा कि दूसरे कमरों में हो रही फर्जी वोटिंग को रोकने वाला पूरा सिस्टम ही मिलकर यह काम करा रहा था। जब चुनाव अधिकारी से लेकर पुलिस बल तक शामिल हो तो किस तरह इसका विरोध किया जाए? फिर बोला, 'लेकिन तू इस बात पर गर्व कर सकती है कि मैंने अपने कमरे में एक भी फर्जी वोट नहीं पड़ने दिया।' वह यह कहते समय भी हारा हुआ सा था और बोला, ‘आज कह सकता हूं कि चुनाव कराने की यह पूरी प्रक्रिया ही फर्जी है, कोई ऐसा चेक एंड बैलेंस नहीं है कि व्यवस्था में फर्जीबाड़ा कर रहे लोग पकड़ में आएं।’
उस दोस्त ने वीवीपैड पर भी सवाल उठाए; उसके हिसाब से ये पर्चियां थर्मल प्रिंटर से निकलती हैं, जिसका प्रिंट एक समय के बाद उड़ जाता है। ठीक वैसे ही जैसे एटीएम की स्लिप में होता है। उसका सवाल है कि वोट पड़ने से लेकर मतगणना के बीच तक लंबा वक्त है, ऐसे में क्या इन पर्चियों पर प्रिंट रहेगा?
थर्मल प्रिंटिंग या वीवीपैड की इस जानकारी पर मेरा कोई पक्ष नहीं है। यह चर्चा इसलिए लिख रही हूं क्योंंकि यह उस चुनाव प्रक्रिया के हालात बयां करती है, जिसके भरोसे हममें से कई लोग अपनी भविष्य की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इस पूरे अनुभव से जुड़ी कई बातें मेरे लिए नई थीं, शायद आप भी अपरिचित हों।
इस भ्रष्टाचार को आप आम हालात भी कह सकते हैं और यह भी कि क्या यह पहले नहीं होता था? लेकिन आप इसे सैद्धांतिक रूप से सही नहीं बता सकते। पोलिंग अफसरी करने वाले लोग शिक्षक, बैंकर या दूसरे सरकारी महकमों के कर्मचारी होते हैं। वे जिस तरह अपने क्षेत्र में काम करते हैं, वही व्यवहार पोलिंग बूथ पर झलकता है। जब बड़े नेता बड़ी धांधली कर रहे हों तो ऐसे किस्से सामान्य कहे जाने लगते हैं। लेकिन सवाल हर सामान्य बताई जाने वाली बात पर उठते रहने चाहिए। यह प्रकरण एक और बात साफ करता है कि वोट खाली छोड़ने का हश्र क्या हो सकता है।
उस दोस्त ने न्यूटन फिल्म का ज़िक्र क्यों किया, यह नहीं जानती। लेकिन हां ऐसे हालातों में खुद के ईमान को बचाए रखना एक चुनौती ही बन जाता है। ऐसी चुनौती जिसे पार करने के बाद हम खुद पर खुश तो होते हैं लेकिन अपनी आंखों से देखी भ्रष्ट प्रक्रिया के बाद दुख और नाउम्मीदी से भर जाते हैं।
- शिवांगी (7 may 2019)



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