पर्दे पर राजनीति नहीं राजनीतिक निष्ठा की जरुरत
श्रीलंका में महिलाओं पर किसी भी तरह से चेहरा ढकने का प्रतिबंध लगा दिया गया।वैसे तो इस प्रतिबंध की जद में वे सभी महिलाएं आनी चाहिए जिन्हें अपने-अपने धर्मों की मान्यता, रीति या धार्मिक पहचान के नाम पर चेहरा या सिर ढकना पड़ता है।लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर मुस्लिम महिलाओं पर पड़ना तय है। अब ऐसे ही प्रतिबंध की खबर केरल से आई है, जहां अल्पसंख्यक महिला कॉलेज में बैन लगा है।
भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम महिलाएं बुर्का या नकाब पहनती हैं, जबकि मध्य एशिया व यूरोप के अधिकांश देशों में रहने वाली मुसलमान महिलाएं हिजाब पहनती हैं।बुर्का में आंखों को छोड़कर सिर से लेकर पांव तक पूरा शरीर ढका होता है। जबकि हिजाब का काॅन्सेप्ट है कि महिला का चेहरा छोड़कर उसके बाल, कान, गला व वक्ष स्थल ढका रहे।
यह बात याद रखें कि अभी भी श्रीलंका में महिलाएं सिर ढाक सकती हैं, पाबंदी सिर्फ चेहरा ढकने पर है। यानि वहां घूंघट या पर्दा करने वाली हिंदू महिलाएं, सिर ढकने वाली सिख, ईसाई और बौद्ध महिलाओं की हालत में बदलाव नहीं आएगा। इसका एक मतलब यह भी है कि मुस्लिम महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर जाने के लिए बुर्का पहनने की जगह अब हिजाब अपनाना पड़ सकता है, क्योंकि जाहिर है कि उनके सामाजिक परिवेश में मर्द उन्हें बिना सिर ढके रहने की स्वतंत्रता नहीं देंगे।
अब अगर मान भी लें कि यह फैसला सुरक्षा के लिहाज से है, ताकि चेहरा छुपाने के लिए पहने जाने वाले बुर्का या नकाब की आड़ में कोई पुरूष आतंकी किसी घटना को अंजाम न दे सके। ऐसी स्थिति में भी यह प्रतिबंध आधी सुरक्षा ही सुनिश्चित कराता है, क्योंकि सिर ढकने का विकल्प मिलना ही किसी को भी अपनी पहचान छुपाने की गुंजाइश दे देता है। अगर मामला सुरक्षा का ही था तो आश्वयकरूप से श्रीलंकाई सरकार को सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं को सिर और चेहरा ढाकने से प्रतिबंधित कर देना चाहिए था। ताकि किसी भी धर्म की महिला के वेष में कोई आतंकी सिर ढांकने का लाभ लेकर कभी किसी घटना को अंजाम न दे पाए। क्या श्रीलंकाई सरकार मानती है कि आतंकी सिर्फ मुस्लिम महिला के वेषभूषा में ही आकर चकमा दे सकते हैं? अगर ऐसा माना जा रहा है तो इसका मतलब सरकार मानती है कि आतंकी या तो मुसलमान होते हैं या फिर मुस्लिम धर्म की आड़ लेते हैं। जबकि वहां बौद्ध, हिंदू अतिवादी दल लगातार आतंकी हमले करते रहे हैं।
इस तथ्य के आधार पर यह सवाल उठता है कि किसी भी तरह से चेहरा ढकने का प्रतिबंध नागरिक सुरक्षा से जुड़ा मामला भर नहीं है। बल्कि बुर्का बैन राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसी राजनीति जो किसी भी क्षेत्र या देश में अपने यहां के बहुसंख्यक धर्म विशेष के प्रभुत्व को बनाए रखने के हिसाब से चलती है। अगर ऐसा नहीं होता तो श्रीलंका अपने यहां के बहुसंख्यक बौद्ध, हिन्दु, ईसाइयों में महिलाओं के सिर ढंकने की मान्यता पर भी सुरक्षा संबंधी सवाल उठाती। लेकिन तब इन धर्मों के गुरू, क्लर्जी या ठेकेदारों के निशाने पर सरकार होती।
यह भी समझने योग्य है कि श्रीलंका से पहले दुनिया के 13 देशों ने महिलाओं के चेहरा ढांकने पर ही प्रतिबंध लगाया। चेहरा और सिर ढांकने का प्रतिबंध लगाकर हर धर्म के इस प्रपंच के खिलाफ खड़े होने का दम सिर्फ पांच देश ही दिखा सके हैं। वे देश हैं - फ्रांस, कोसोबो, अजरबाइजान, ट्यूनेशिया और टर्की। खास बात यह भी है कि ये सभी देश मुस्लिम बहुल्य हैं।
देखिए हर धर्म पूरी तरह से पुरूष केंद्रित है और यह पुरूषसत्तामक समाज में उसका वर्चस्व बनाए रखने के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक नियमों को आधार बनाकर हर धर्म के पुरूष अपने यहां जन्म लेने वाली महिलाओं का सामाजिक दायरा सीमित करते हैं, ताकि उनकी यौनि पर उस समुदाय या धर्म विशेष के पुरूषों का ही अधिकार रहे। इस तरह उनके धर्म में जन्मी औरत उसी समुदाय की संख्या बढ़ाने के काम में लायी जाती है। पुरूषवादी समाज में औरत एक वस्तु है, उसकी प्रजननक्षमता उसका एकमात्र गुण। सभी धर्मों के नियम हैं कि औरत इस क्षमता को अपने परिवार, समुदाय या धर्म के पुरूष के लिए बचाकर रखेगी, कोई दूसरा पुरूष उससे आकर्षित न हो जाए या वह खुद सीमा पार न कर दे, इसके लिए हर घर्म में औरतों के लिए परदा रखा गया है। यह परदा औरतों को ऐसे अंगों को ढंकते कहता है, जिसे नियम बनाने वाले पुरूष भड़कीला मानते हैं। हर धर्म में औरतों को किशोरावस्था से ही बताया जाता है कि उनके अंगों को देखने भर से पुरूष अपने नियंत्रण खो सकते हैं और औरत का शारीरिक शोषण हो सकता है। यह पर्दा कहीं अल्लाह, भगवान या ईशु की शान में किया जाता है, कहीं बड़े-बुजुर्ग पुरूषों के सम्मान के नाम पर। पर्दा, नकाब, घूंघट, पल्लू जैसे तमाम नाम वाले तरीकों के रूप में हम इसे जानते हैं।इन पर्दों को धर्म की पहचान से जोड़ दिया गया है।
आदमियों ने अपनी औरत को घर में रहकर धर्म के पालन का जिम्मा दे रखा है, धर्म के हिसाब से बच्चे पालकर नई पीढ़ी में पुरानी रीतियों को भरना महिला की जिम्मेदारी है। महिला इस जिम्मेदारी को अपना अस्तित्व मानती है इसलिए धर्म उसके लिए बड़ा प्रश्न बन जाता है। यही कारण है कि पर्दे को धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान के रूप में जीने वाली औरत को पर्दे के खिलाफ बात करना उसके अस्तित्व और आजादी के खिलाफ बात करना लगता है। दूसरी ओर, धर्म चलाने वाला पुरूष तो ऐसे प्रतिबंधों को अपने धर्म पर हमला बताता ही है।
यही से मतभेद शुरू होता है औरत की धार्मिक चुनाव की स्वतंत्रता को लेकर। बुर्का बैन को बहुत से उदारवादी लोग मुस्लिम महिलाओं के धार्मिक चुनाव की स्वतंत्रता से जोड़कर इसका विरोध करते हैं। ऐसा करते समय असल में वे धर्म को उस महिला से अधिक प्रार्थमिकता दे रहे होते हैं। पर्दा अगर इस्लामिक कल्चर का हिस्सा होता तो इसे महिलाओं पर ही क्यों लागू किया गया, पुरूष भी पर्दा करते। या धार्मिक चुनाव की स्वतंत्रता में पर्दा करने का चुनाव ही क्यों शामिल है, पर्दा न करने की स्वतंत्रता को क्यों इसमें नहीं रखा गया?
दूसरी ओर, बुर्का या नकाब बैन की मांग करने वाले पितृसत्तामक व दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग व राजनीतिक दल सिर्फ बुर्का तक ही प्रतिबंध की मांग को सीमित रखते हैं। वे सभी धर्मों की महिलाओं को इन गुलामी के प्रतीकों से हटाने की बात नहीं कह रहे होते, इसलिए उनकी यह मांग भी घोर सियासी होती है। जिसकी आड़ में वे विशेष धर्म को निशाना बना रहे होते हैं।
दुनियाभर की महिलाएं तमाम तरह के पर्दों में पैदा होकर मरने तक की जिंदगी गुजार देती हैं, उस पर्दे से बाहर एक खुली दुनिया को देखने का अवसर उन्हें बस उस घूंघट, बुर्के या पर्दे की ओट से ही मिलता है। ऐसे सिर पर रखे जाने वाले पर्दे और चेहरा ढांकने वाले पर्दे को सिरे से खत्म किया जाना चाहिए। लेकिन किसी सियासत के लिए इस पर्दे को आधे-अधूरे ढंग से खत्म किए जाने की मांग या कार्रवाई तो ऐसे पर्दे के प्रति और कट्टरता ही पैदा करेगी। उस धर्म के क्लर्जी और महिलाएं खुद ही प्रतिबंध के विरोध में आ जाएंगी, क्योंकि वे उस पर्दे को अपनी पहचान के रूप में देखने के लिए अनुकूलित की गई हैं।
नारीवाद कहता है कि दुनिया की सभी धर्म, क्षेत्र, रंग, भाषा की महिलाएं, उनके अनुभव, उनकी चुनौतियां, उनकी पसंद, उनकी सोच, उनके सुख-दुख, इच्छाएं अलग-अलग हैं। उन्हें किसी एक रंग में ढालने की कोशिश न की जाए, न कोई एक इन महिलाओं की स्थिति सुधारक या पहरूए की तरह खुद को देखे। औरतों को वह सब सोचने, करने और पहनने की आजादी मिले जो वे चाहती हैं। लेकिन नारीवाद कभी पितृसत्तामक व्यवस्था को चलाने के लिए बनाई गई रीतियों का और उन रीतियों को औरत का अस्तित्व बताने वाली मानसिकता का समर्थन नहीं करता। इस कारण हर धर्म द्वारा औरत पर चालाकी से थोपा गया पर्दा एकतरफा है और इसे औरत के धार्मिक पहनावे का अंग नहीं माना जा सकता।
- शिवांगी (3 may 2019)




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