संदेश

चिड़िया मां

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अभी खबर मिली किसी ने जनी है बच्ची बन गयी हूँ मां महसूस हो रही है जिम्मेदारी पर असुरक्षा या भार नहीं यह, सतर्कता है कि.. उंगली बराबर उस हथेली को कैसे थामूं और कर लूं दोस्ती। यह भी कि.. चौंधियती आंखों के सामने कैसे होऊं खड़ी साया बनकर। हां वादा भी है कि .. नई दुनिया के लिए अभ्यस्त होते ही हटा लूंगी सब साये उड़ान देखूंगी तुम्हारी चिड़िया मां की तरह।। - शिवांगी , 12 अक्तूबर 2018 (कल एक सहकर्मी के घर बेटी का जन्म हुआ, खबर सुनकर उस बच्ची के लिए यह कविता लिखी। तस्वीर मेट्रो में परसो मिली एक छोटी बच्ची की है, बच्चे के हाथ को थामते ही कितना ज़िम्मेदार महसूस करते हैं हम।)

INSPIRER || PUSPA GUPTA

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Interview by shivangi

समलैंगिकता ; विषमलैंगिक पितृसत्तामक समाज से जुड़ाव और अप्राकृतिकता का कारण

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गर्मी की एक दोपहर दसवीं में पढ़ने वाला एक लड़का घर की पहली मंजिल पर बने अपने कमरे को बंद किए बैठा है। स्कूल से आकर बस उसने खाना खाया और जा घुसा अपने कमरे में... रुटीन के मुताबिक आधे-पौने घंटे में उसका दोस्त भी आ जाता है। दोनों खेलते हैं, क्योंकि लू भरी दोपहरी में बाहर निकलने की इजाजत दोनों को नहीं। दूसरी ओर, खाना खाकर घर के सब सदस्य पहुंच चुके हैं अपने-अपने बिस्तर पर। लड़के की मां बड़बड़ाने लगती हैं.. 'दोनों लड़के खाना खाकर आराम भी नहीं करते, बस हर वक्त खेलना।' वह अपनी बड़ी बेटी से कहती हैं- 'जरा जा दोनों लड़कों को डपट आ। ' लड़की जाती है.. कमरे में कुछ एकदम नया सा देखकर घबराहट और गुस्से में नीचे भाग आती है। मां को बताती है कि ऊपर दोनों 'गंदा काम' कर रहे हैं, फिक्र से कहती है कि दोनों भाई बिगड़ गए।  कमरे में बंद दोनों किशोर अब सहम गए हैं.. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा। लड़के का दोस्त उठकर पहले जीने का दरबाजा लगाता है और खुद छत पर भाग जाता है। अब पहली मंजिल पर खड़ा वह लड़का रो रहा है.. अपनी मम्मी को आवाज दे रहा है कि उसका दोस्त मर न जाए। कह रहा है कि दोस्त ...

मम्मी का दिल्ली सफर..

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छोटे शहर के लोग अक्सर दिल्ली मरीज की दवाई लेने के वास्ते आते हैं। मेरी मम्मी भी कुछ सात-आठ साल पहले मेरी छोटी बहन की दवाई लेने ही दिल्ली आईं थीं, उसके बाद कभी ऐसा मौका नहीं आया कि वो बच्ची ही दुनिया छोड़ गई। 15 दिन पहले जब मैं घर गई तो उन्होंने जिद की कि वो साथ जाएंगी, हालांकि जल्द ही में डायग्नोज हुई डायबिटीज के कारण उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। हम रात में चले, मम्मी के साथ कई साल बाद मैंने कोई सफर किया, पहले नानी और मौसी के घर मम्मी साथ जाना होता था। खैर, लगभग खाली बस में हम दोनों बैठे, रास्ते में टॉयलेट आना कितनी बड़ी समस्या हो सकती है, यह मुझे उस दिन महसूस हुआ। सो रहे कंडक्टर को जगाकर कहीं गाड़ी रुकवाने के लिए कहना, फिर उसका बड़े अहसान और एक बार गुस्सा होकर भी गाड़ी रुकवाना मुझे बहुत गंदा लगा। दूसरी तरफ इस नेचर कॉल के लिए भी मम्मी को शार्मिदगी का अनुभव हो रहा था कि उनके कारण बार बार बस रोकनी पड़ रही है। उनके ऐसे भाव देखना खुद में बड़ी वर्नेवल फीलिंग थी, एक बार मैं बैठे-बैठे रोने भी लगी, हालांकि तब वह दूसरी सीट पर सो रही थीं। ऐसा मेरे साथ पहली बार जब वो मेरे लिए मम्मी नहीं बल्कि कोई ...

खिड़की

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कितनी जरुरी है खिड़की तुम्हारे लिए? जानना हो तो चांद को न निहारो जरा टहल आओ नीचे और देखो ... खिड़की के बाहर क्या पड़े हैं सिगरेट के खोखे जिन्हें आधा पीकर ही, तुमने छोड़ दिया था ताकि दिखता रहे उस पर नाम महंगी कंपनी का। खिड़की के बाहर क्या पड़े हैं वो गुब्बारे जिन्हें देखकर तुम पुचकारती थीं अपनी न पैदा हो सकी औलादों को..। यह भी देख आओ क्या वो भाव पड़े हैं ग्लानि के जो सुबह उठकर महसूस करती थी तुम और क्या वो रातें भी जब फिर बंद कर लेती थीं तुम खिड़की। - शिवांगी (5 सितंबर 2018)

जींस वाली लड़कियां

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मैं अच्छी तरह परिचित हूं इनसे.. सरपट दौड़तीं, उससे तेज खिलखिलातीं साड़ी और सलवार सूट देख मुंह बिचकातीं स्कर्ट पहनने की चाह दबाए एक ही रंग की कई जींस खरीद लाती हैं। हिंदुस्तानी मध्यवर्ग जैसी तो हैं। बड़ा बनने की तमन्ना मन में लिए, खुले कपड़ों को बस ताकती रहतीं है। गर्मियों में जींस जब काटती हैं तब बहुत लानत भेजतीं अपनी सनक पर। सुना है मजदूरों का पहनावा थी जींस एक फिल्म में देखा- 'जींस का हक, जीने का हक।' पापा कहते 'सभ्य पहनावा' टांगे नहीं दिखती लड़कियों की। अब देती है घूंघट सी घुटन। ऐसी जींस अब लगती बंधन आसपास अपने जैसियों को  टखने-घुटने से फटी डिजायन वाली जींस पहने देखकर जाने क्यों लगता है डिजायनर बुर्का पहनी हों। - शिवांगी, 11.फरवरी. 2018