मम्मी का दिल्ली सफर..
छोटे शहर के लोग अक्सर दिल्ली मरीज की दवाई लेने के वास्ते आते हैं। मेरी मम्मी भी कुछ सात-आठ साल पहले मेरी छोटी बहन की दवाई लेने ही दिल्ली आईं थीं, उसके बाद कभी ऐसा मौका नहीं आया कि वो बच्ची ही दुनिया छोड़ गई। 15 दिन पहले जब मैं घर गई तो उन्होंने जिद की कि वो साथ जाएंगी, हालांकि जल्द ही में डायग्नोज हुई डायबिटीज के कारण उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। हम रात में चले, मम्मी के साथ कई साल बाद मैंने कोई सफर किया, पहले नानी और मौसी के घर मम्मी साथ जाना होता था। खैर, लगभग खाली बस में हम दोनों बैठे, रास्ते में टॉयलेट आना कितनी बड़ी समस्या हो सकती है, यह मुझे उस दिन महसूस हुआ। सो रहे कंडक्टर को जगाकर कहीं गाड़ी रुकवाने के लिए कहना, फिर उसका बड़े अहसान और एक बार गुस्सा होकर भी गाड़ी रुकवाना मुझे बहुत गंदा लगा। दूसरी तरफ इस नेचर कॉल के लिए भी मम्मी को शार्मिदगी का अनुभव हो रहा था कि उनके कारण बार बार बस रोकनी पड़ रही है। उनके ऐसे भाव देखना खुद में बड़ी वर्नेवल फीलिंग थी, एक बार मैं बैठे-बैठे रोने भी लगी, हालांकि तब वह दूसरी सीट पर सो रही थीं। ऐसा मेरे साथ पहली बार जब वो मेरे लिए मम्मी नहीं बल्कि कोई बच्चा थीं, मैं बार-बार उठकर दूसरी सीट पर देख रही थी कि वह ठीक हैं या नहीं। अपने मां-बाप को कमजोर देखना वाकई बहुत बुरी फीलिंग होती है। कुछ देर के लिए आंख लग गई, जब आंख खुली तो बस बहुत देर से रुकी हुई थी। पता लगा आगे लंबा जाम है.. फिर शुरु हुआ सात घंटे लंबे इंतजार का समय। मम्मी कभी गुस्सा करतीं कि ये लड़की ट्रेन से नहीं जा सकती, कभी कहतीं किसी के साथ बेमन उसके घर नहीं जाना चाहिए। मैं बस बहुत जोर से हंस देती..क्योंकि उनका मेरे किराए के कमरे को मेरा घर मानना ही मेरे लिए सबसे बड़ी बात थी। कभी पूछतीं कि कितनी देर में चलेगी? मैं उन्हें ऐसे समझाती जैसे किसी गर्मी से परेशान, थके-हारे छोटे बच्चे को समझा रही होऊं कि बस थोड़ी सी देर और..। शरीर से भारी किसी व्यक्ति का 12 घंटे तक बस में बैठे रहना कितना मुश्किल होगा..ये मैंने महसूस किया। हम तीन बजे दिल्ली पहुंचे.. जब मैं उन्हें सीढ़ियों से ले जा रही थी तो उन्होंने पूछा खुशी के साथ आए थे तो चलने वाली सीढ़ियां थीं? मैंने कहा कि वो सीढ़ियां तो हैं पर मुझे लगा कि तुम्हें डर लगेगा, इसलिए नहीं ले गई। फिर मेट्रो पर जाने के लिए हमने एस्केलेटर लिया। मैं एकदम डरी हुई थी, बार-बार मुझे फाइनल डेस्टिनेशन का वो सीन याद आ रहा था जब जूते की लेस एस्केलेटर में फंसने के बाद एक बड़ा हादसा हो जाता है। पर मम्मी चढ़ गईं, उन्हें कैसा लग रहा था.. वो मैंने नहीं देखा क्योंकि मेरा ध्यान बस इस बात पर था कि उनका हाथ मुझसे छूट जाए और जहां सीढ़ियां खत्म हो रही हैं, वहां से वो ठीक ढंग से बाहर आ सके। मेट्रो में उन्हें थोड़ी राहत मिली, सेक्टर 15 के लिए जब यमुना बैंक से हमने मेट्रो बदली तो लेडीज कोच में बैठने की जगह नहीं थी। पर एक हमउम्र लड़की ने दूर से इशारा किया और कहां आंटी को इधर भेज दीजिए। मम्मी बड़ी खुश हुईं कि बड़े शहर में भी बच्चे 'अच्छे' होते हैं। यह बात भले छोटी सी हो पर मुझे उस लड़की की शक्ल आज तक याद है और उस वक्त उसके सीट देने के कारण मैं बहुत अहसानमंद भी थी, अब मैं हमेशा फॉलो करती हूं कि मेट्रो में कोई मुझसे बड़ा मेरे बैठने पर खड़ा न रह जाए। हम घर आए..मेरे घर में नीचे रह रही आंटी की बेटी ने सिर्फ इतना जानकर कि वह मेरी मम्मी हैं, उन्हें गले से लगा लिया। मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात थी। मम्मी को वो किराए का कमरा बहुत अच्छा लगा। मम्मी मुझसे मैक्सी पर ओढ़ने के लिए चुन्नी मांग रही थीं, मेरे पास थी ही नहीं और फिर शायद वो पहली बार बाजार तक ऐसे ही गईं। अगले दिन ऑफिस से आने के बाद हमें गुड़गांव जाना था, मेरे मौसा जी से मिलने। मेट्रो में बैठे तो मम्मी अनाउंसमेंट सुनकर साथ में उसी अंदाज में दोहरा रही थीं, मेट्रो की लागत और इससे जुड़े तमाम सवाल पूछ रही थीं। हौजखास स्टेशन बेहद खूबसूरत था, जहां मैंने उनकी ये दो तस्वीरें खींचीं। पर वहां का टॉयलेट बहुत गंदा था, मैंने के अटेंडेंट को रुपये देते समय नाराजगी जाहिर की। उसने बड़े प्रेम से सॉरी कहा, बोला अब मैं साफ करवा देता हूं। तब मम्मी बड़े प्यार से बोलीं कोई बात नहीं आप भी तो हमारे बच्चे हो, हो जाता है... उसने मम्मी से हैंडशेक करके थैंक्यू कहा। वो हैंड शेक और उस वक्त मम्मी के चेहरे के भाव बहुत खास थे, महिलाओं के जीवन में बहुत से लोग उनके पैर तो छूते हैं पर हैंडशेक का मौका उन्हें कब मिलता है। खैर हम एमजी रोड स्टेशन पर उतर गए, पापा का कॉल आ गया। मम्मी ने पापा से कहा कि लड़की मेरी बहुत ख्याल रख रही है, बदल गई है। (तब मैं सोच रही थी कि बच्चे मां-बाप की मर्जी के बिना अपनी मर्जी का करने लगें जैसे मैं नौकरी कर रही हूं, तो किस तरह की गलतफहमियां दोनों ओर से आने लगती हैं। ) फिर उन्होंने कहा कि यहां तो एकदम अलग दुनिया है, बाहर निकलना चाहिए। मौसाजी के साथ उनके घर जाते समय गाड़ी में मम्मी चुपचाप बस उस शहर को निहार रही थीं। हम पहुंचे खूब बातें हुईं, अगले दिन लौट आए। अगले दिन शालिनी जी आईं, बातचीत के दौरान मम्मी ने जाना कि एक समय वो जिन लोगों को मुझे बिगाड़ने वाला कहती थीं, वह वही थीं। दलित, ब्रह्मण, शादी की जरुरत और तमाम मुद्दों पर लगभग बहस सी हुई। अगले दिन सुबह मम्मी को वापस बरेली जाना था। सुबह तैयार होने के बाद हम निकले। स्टेशन पर पहुंचकर लिफ्ट लेने लगे तो देखा कि एक विकलांग लड़की बाहर खड़ी रह गई और बाकी लोग लिफ्ट में चढ़ गई। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, मैंने जब कहा कि यह तो गलत है तो मम्मी भी बोलीं और शर्माकर दो लोग बाहर निकले और वह लड़की फिर ऊपर जा सकी। अगली बारी में कई लोग लिफ््ट में चढ़ गए, मम्मी भी, मैं रह गई तो मम्मी भी उतर आईं, बोलीं नहीं हम साथ में ही जाएंगे। फिर आखिरकार हम ऊपर पहुंचे, मेट्रो ली। रास्ते में एक व्यक्ति ने उठकर मम्मी को सीट दे दी। कुछ देर के बाद उनके पास की सीट खाली हुई तो वो अंकल बैठने लगे और मम्मी ने मुझे बैठने के लिए आवाज दी। वो अंकल रुक गए, मुझे बहत गंदा लगा, मैंने उन्हें कहा कि आप बैठ जाएं। वो शायद उनका प्यार ही था, पर हम कैसे प्यार में स्वार्थी हो जाते हैं न। मैंने उनके फिर कहा कि अगर इस तरह ही हम अपनों के लिए ही सीट बचाते रहेंगे तो कभी किसी जरुरतमंद को सीट नहीं मिल पाएगी। तब तो मम्मी ने बस चल ... कह दिया। स्टेशन पर पहुंचे तो वहां भी मम्मी मेरे लिए सीट घेरने लगीं... मुझे नहीं पता कि उन्हें मेरी कही बात क्यों याद नहीं रही। ट्रेन में उनको जैसे ही मैंने बैठाया वो रोने लगीं.... बहुत ज्यादा भावुक हो गईं। कहने लगीं कि हम अकेले हो गए हैं, मैंने कहा कि ठीक है मैं आ जाती हूं पर क्या तुम पूरी जिदंगी मुझे सिर्फ अपने पास रखने को राजी होगी? वह दीदी का उदाहरण देने लगीं कि शादी तो जरुरी है.. वो कितनी खुश है। खैर.. गाड़ी चलने में समय था पर मुझे ऑफिस पहुंचना था तो मुझे निकलना पड़ा,.. वो गेट पर आकर खड़ी हो गईं। मैंने पलटकर देखा तो रो रही थीं..मैं फिर पास गई, उन्हें गले लगाया..इस बार मैं भी कंट्रोल नहीं कर पाई.. उन्होंने पूछा कि मैं कब घर आऊंगी तो मुझे हंसी और रोना आने लगा, क्योंकि मैं वहां पांच दिन रुककर ही लौटी थी। खैर फिर ऑफिस जाने के लिए लौटने .. मैंने जब-जब पलटकर देखा और जहां तक वो दिख रही थीं वो सिर्फ मेरी तरफ देख रही थीं.... और यह था मम्मी का दिल्ली सफर, जिसमें वो कुछ नहीं घूम पाईं पर उन्होंने और मैंने कुछ नए अहसास जरुर महसूस किए।


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