महिलाओं के सार्वजनिक जगहाें पर सुरक्षित आवाजाही का सवाल काैन उठाएगा..?

16 December 2012.....
ये तारीख भारत के इतिहास में एक युग की शुरूआत के ताैर पर जानी जा सकती है जब बलात्कार ...दुष्कर्म .. इज्जत लूटना ... सामूहिक दुष्कर्म .. सब बहुत तेजी से सामने आने लगा. लाेगाें काे लगा निर्भया के बाद रेप बढ़े भले नियमाें में सख्ती भी आई हाे ... जबकि मीडिया कवरेज बढ़ने से बड़ी संख्या में घटनाएं सामने आने लगी. सेल्फ डिफेंस का मतलब आैर संभव प्रशिक्षण बढ़ गए. हर काेई लड़कियाें काे जबरन बेटी बनाकर उनकी सुरक्षा में चिंतित दिखने लगा. इस फिक्र ने कई लड़कियाें के दूसरे शहर जाकर पढ़ने पर ब्रेक लगाया .. रात में घर से बाहर निकलने से पहले लड़कियां खुद साेचने लग गईं. पिछले दिनाें दाे बेटियाें की मां से मिली ताे वाे बताने लगीं कि दिल्ली रेप कांड के कुछ दिन बाद ही बेटी का एमबीए में दाखिला कराना था पर उसने डर से उस शहर जाने से ही मना कर दिया.. खुद की सुरक्षा का उसका डर आज भी कायम है. पिछले साल अपनी बेटी से प्रेम की बात करते हुए एक सहयाेगी ने बड़े फक्र से बताया कि बेटी के लिए सब खुद खरीद कर लाता हूं .. इतनी सीधी आैर लाडली है कि पड़ाेस की दुकान तक जाने के लिए भी पापा चाहिए..! पापा ... भाई...पति ... इनके बिना किसी लड़की का बाहर निकलना जैसे खतरे काे दावत देना हाे गया हाे. ...और दाेस्त के साथ चलना ..ताे खुद खतरा लेकर चलना..उस िनर्भया के जैसे. सार्वजनिक स्थानाें पर लड़कियाें की सुरक्षित आवाजाही .... निर्भया हमारे सामने ये सवाल छाेड़कर गई जाे हम भुला चुके हैं. पब्लिक एक्सेस बढ़कर ही िहंसा घटेगी ... पर हम उल्टा चल रहे हैं. जाे लड़कियां परिवार से लड़ झगड़कर एेसे काम कर भी रही हैं जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र से ज्यादा संबंध आैर रात में आने जाने की चुनाैतियां हैं .. वहां भी उनकी सुरक्षा पूरी तरह उनके हाथ में है... जिम्मेदार कार्य स्थलाें काे इससे काेई खास सराेकार नहीं. कुछ भी गलत हाेते ही ' लड़की काे रात में घूमने का शाैक था' .. आसानी से सुनने काे मिल सकता है. सेफ पब्लिक एक्सेस के निर्भया के सवाल काे हम कब समझ पाएंगे??

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