प्यार...साथ... सेक्स एक नहीं.
यूएन के आंकड़े के हिसाब से हर तीन में से एक महिला अपने पूरे जीवन में रेप या दूसरी शारीरिक और मानसिक हिंसा काे झेलती हैं. संसार की एक अरब महिलाएं और लड़कियांं. ताे इन एक अरब काे जगाने के लिए और किसी भी हिंसा के खिलाफ अपना विराेध दर्ज कराने काे वेलनटाइन डे के दिन वर्ष २०१२ में शुरू हुआ 'वन बिलियन राइजिंग डे'.
आज हम जिस प्रेम और विश्वास के दिन काे मना रहे हैं वाे किसी भी तरह के डाेमिनेशन से भरा ताे नहीं? विश्लेषण कीजिए ... कहीं प्यार/सुरक्षा/जिम्मेदारी के नाम पर पित्तसत्ता में पिस ताे नहीं जा रही भावनाएं? दाेस्त/पति/िपता/भाई से कैसा है तुम्हारा संबंध... ? कितना पेट्रियार्कल ... और हां तुम्हारा व्यवहार .... तुम भी कही उस संरचना में पैदा हाेकर उन जैसी ताे नहीं हाे गई? जांचाें अपनी परवाह कही जाने वाली हरकताें काे ... पजेशंस काे ... प्यार काे बाेझ बना लेना इन सबका परिणाम ही है. न बाेझ बनाे ...न बनने दाे. जब हम साथ काे प्यार कहते हैं ... शादी का वादा .... जन्माें का बंधन .. और भी तमाम भाव ... इनके पीछे सिर्फ एक थ्याेरी काम करती है कि हम अकेले अपने अस्तित्व की कल्पना तक नहीं कर सकते, एक पुरुष चाहिए ही.
'प्यार'...'साथ'... 'सेक्स' ये तीन अलग बातें हैं. दिक्कत ये है कि हमने तीनाें काे जाेड़ दिया है. यही कारण है कि जिससे प्यार हाे .. उसे किसी और से हमबिस्तर हाेते हम देख नहीं पाते ... खुद काे कभी इन सबके लिए अलाव करना ... हमें चरित्र पर सवाल लगता है. एक्स्ट्रा अफेयर्स ...ये छिपे हुए रिश्ते समाज की सच्चाई हैं. और इनके हाेने का कारण भी पित्तसत्तात्मक संरचना ही है.
एक दूसरे काे जकड़ लेना चाहते है हम ... इसलिए ही इतने सालाें बाद भी भारत में लिव-इन का फार्मुला कारगर नहीं. संबंध टूटते ही रेप की ताेहमत...
रिश्ते काे खुला छाेड़ने की हिम्मत कितनाें में है यहां? हर किसी ने रात में साथ खाना खाने का ख्वाब सजाया है! जबकि प्यार ताे बस अहसास का नाम है... हाेना चाहिए. अकेले रहना अकेलापन नहीं हाेता मेरे दाेस्त.
कितनी शर्तें लगा देते हैं न हम . मैं तब ही आई लव यू का जबाव दूंगी जब तुम मुझसे शादी करने का वादा कराे... हा..हा . कितना स्टूपिड है ये ... जाे प्यार अभी अभी पैदा हुआ .... उसमें इतनी सारी संभावनाएं खाेजना! .... भार बना देना. लड़की के किसी और से शादी के फैसले पर लड़के का मजनू बन जाना .... या एसिड अटैक!!
बस एक और आखिरी बार कहना है कि प्यार...साथ... सेक्स एक नहीं.
आज हम जिस प्रेम और विश्वास के दिन काे मना रहे हैं वाे किसी भी तरह के डाेमिनेशन से भरा ताे नहीं? विश्लेषण कीजिए ... कहीं प्यार/सुरक्षा/जिम्मेदारी के नाम पर पित्तसत्ता में पिस ताे नहीं जा रही भावनाएं? दाेस्त/पति/िपता/भाई से कैसा है तुम्हारा संबंध... ? कितना पेट्रियार्कल ... और हां तुम्हारा व्यवहार .... तुम भी कही उस संरचना में पैदा हाेकर उन जैसी ताे नहीं हाे गई? जांचाें अपनी परवाह कही जाने वाली हरकताें काे ... पजेशंस काे ... प्यार काे बाेझ बना लेना इन सबका परिणाम ही है. न बाेझ बनाे ...न बनने दाे. जब हम साथ काे प्यार कहते हैं ... शादी का वादा .... जन्माें का बंधन .. और भी तमाम भाव ... इनके पीछे सिर्फ एक थ्याेरी काम करती है कि हम अकेले अपने अस्तित्व की कल्पना तक नहीं कर सकते, एक पुरुष चाहिए ही.
'प्यार'...'साथ'... 'सेक्स' ये तीन अलग बातें हैं. दिक्कत ये है कि हमने तीनाें काे जाेड़ दिया है. यही कारण है कि जिससे प्यार हाे .. उसे किसी और से हमबिस्तर हाेते हम देख नहीं पाते ... खुद काे कभी इन सबके लिए अलाव करना ... हमें चरित्र पर सवाल लगता है. एक्स्ट्रा अफेयर्स ...ये छिपे हुए रिश्ते समाज की सच्चाई हैं. और इनके हाेने का कारण भी पित्तसत्तात्मक संरचना ही है.
एक दूसरे काे जकड़ लेना चाहते है हम ... इसलिए ही इतने सालाें बाद भी भारत में लिव-इन का फार्मुला कारगर नहीं. संबंध टूटते ही रेप की ताेहमत...
रिश्ते काे खुला छाेड़ने की हिम्मत कितनाें में है यहां? हर किसी ने रात में साथ खाना खाने का ख्वाब सजाया है! जबकि प्यार ताे बस अहसास का नाम है... हाेना चाहिए. अकेले रहना अकेलापन नहीं हाेता मेरे दाेस्त.
कितनी शर्तें लगा देते हैं न हम . मैं तब ही आई लव यू का जबाव दूंगी जब तुम मुझसे शादी करने का वादा कराे... हा..हा . कितना स्टूपिड है ये ... जाे प्यार अभी अभी पैदा हुआ .... उसमें इतनी सारी संभावनाएं खाेजना! .... भार बना देना. लड़की के किसी और से शादी के फैसले पर लड़के का मजनू बन जाना .... या एसिड अटैक!!
बस एक और आखिरी बार कहना है कि प्यार...साथ... सेक्स एक नहीं.
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