आंकड़ाें में बदनाम हाेती अभागिने

महिलाएं रेप काे हथियार बना रहीं हैं ....!
सरकारी आंकड़े, विवेचना में फर्जी साबित हाे रहे दुष्कर्म के केस ताे यही बता रहे हैं. अखबार आंकड़ाें की ये कहानी सरकारी अफसराें के वर्जन के साथ छापते हैं. आम पाठक पढ़ता है और महिलाओं काे दिए जा रहे अधिकाराें के गलत इस्तेमाल की बातें सउदाहरण ऊंची आवाज में घर की महिलाआें काे आगाह करते हुए सुनाता है. सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी हाेने पर भी कहां के आ जा रही है इनमें इतनी कुटिलता ....?? विश्लेषण करने की जरूरत काे पित्तसत्ता में पले दिमाग कहां साेच पाते हैं. पति , भाई , पिता और दूसरे रूपाें में महिला से जुड़ा आदमी अपने हित या इज्जत के नाम पर कानूनी पेंच में करता है औरत का इस्तेमाल. रंजिश के केस में दुष्कर्म से लेकर सामूहिक दुष्कर्म तक की तहरीराें में छिपी हाेती है पित्तसत्ता. पर गालियां खा रही हैं अभागिनें. अखबार में लिख रहे लाेग इस पक्ष काे उठाते ही नहीं. किसी ने पूछा था एक बार ... कि क्याें खबराें में अफसर ..मनाेचिकित्सक का पक्ष हाेता है पर अमूमन समाजशास्त्री का वर्जन नहीं लेते रिपाेर्टर ...? धारा ३७६ के गलत इस्तेमाल के मुद्दे पर मुझे ये बात याद आती है. क्या अखबाराें की जिम्मेदारी नहीं कि आंकड़ाें के जाल के साथ दूसरे पक्षाें काे लिखा जाए ..?

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