असहमति की स्वतंत्रता समझें अभिव्यक्ति के पैरोकार ...



बीते महीने हिन्दी दिवस पर एक लेखक द्वारा मुख्यमंत्री अखिलेश के पैर छूने की घटना सामने आयी । तब सवाल उठा की आज पूंजीवाद की ओर बढ़ रही व्यवस्था में सामाजिक चेतना के प्रणेता भी नेता और सत्ता की लल्लो-चप्पो करने में लग गए हैं । इस बीच बीते पखबाड़े साहित्यकारों ने घुटती अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए विरोध करना शुरू किया। कलम को हथियार बना विरोध जताने वाले लेखकों का साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा विरोध को एक नया स्वरूप देना कइयों को अखरा।
सवाल उठने लगे की क्या लेखक कलाम से चुक गए हैं। जो इस तरह अपनी ही साहित्य अकादमी का अपमान का विरोध दर्ज करने का तटकरम कर रहे हैं । इस बीच कई मीडिया संस्थान बकायदा लेखकों के विरोध को विशेष पार्टी द्वारा प्रायोजित बताकर ...केन्द्रीय सत्तारूण पार्टी के मीडिया प्रवक्ता की भूमिका बख़ूबी निभाने लगे हैं।
सच चाहें जो भी हो, सवाल खड़ा होता है की क्या आज वाकई हम सिर्फ वही सुनना और देखना चाहते हैं जो हमारी विचारधारा के अनुरूप है ...? ऐसा नहीं है कि आज के हालत हिंदुस्तान के लिए नए हैं । इन्दिरा गांधी के आपातकाल में भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को कुचला , लेकिन दोनों हालातों में बड़ा अंतर सिर्फ इतना है कि पिछले मौकों पर देश का बौद्धिक वर्ग पैदा हालातों के मुखर विरोध में उतरा , जिसका तत्कालीन मीडिया ने अपने अस्तित्व से संकट को झेलते हुए भी पूरा सहयोग दिया। इसके बाद ही वह विरोध  आम जन की क्रांति में बदल सका। आज एक आम हिंदुस्तानी जिन अखबार और चैनलों को पढ़ और देखकर अपनी सोच गढ़ता है , उन संस्थानों की कवरेज ही पक्षपातपूर्ण हो गयी है । किस लेखक हो ...किस पार्टी के शासन काल में ... कौन सा पुरस्कार ... किसकी विशेष कृपा के चलते दिया गया ..... इन बिन्दुओं पर खोजी पत्रकारिया कर रहे मीडिया संस्थान खुद में झांक कर क्यों नहीं पूछते सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ बिगाड़ हिन्दू वोट बटोरने की राजनीति कर रही भाजपा के विरुद्ध पैदा हुए विरोध पर कालिख पोतकर क्या वाकई लोकतन्त्र का कोई स्तम्भ खड़ा भी रह पाएगा। सत्ता, पैसा और पुरस्कार पाने में अंदरखाने होने वाले खेलों को सार्वजनिक किया जाना निश्चय ही ज़रूरी है। लेकिन क्या इस समय जो कवरेज अखबार और चैनल कर रहे हैं, वह निष्पक्ष है? ये विरोध सरकार द्वारा प्रायोजित  धार्मिक असहि’.kqrk  के खिलाफ है । अगले चार साल में ये तस्वीर शायद और भयावह होगी । आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ ज़रूरी है कि हम असहमति कि स्वतन्त्रता के अधिकार पर भी चिंतन करें । विरोध जताने वाले के अंदर ही खामियान निकालकर उसे दबाने की राजनीति करने भर से स्थ स्थितियाँ नहीं सुधारने वाली । 'गांधी का  भारत या मोदी का भारत' का ये दौर और भी दादरी कांड दिखाएगा । मीडिया से अपेषा है कि अभिव्यक्ति और आज़ादी की पैरोकारी करना अगर सच में अपने ज़िम्मेदारी समझता है तो असहमति की आज़ादी और वर्तमान विरोध को अपने कैमरे के लेंस और कीबोर्ड पर छाई राजनीतिक गर्द हटकर देखने की कोशिश करे .....  

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