इंतज़ार की अमावस्या......

पानी के दो घूंट तो शायद नहीं उतरेंगे
आज भी हलक से मेरे...
हथेलियों में मेहंदी नहीं लगाऊँगी
तो भी पिछले बीते सालों की वो पीली खुशबू
आज भी उतर ही आएगी हथेलियों में अपने आप।

तुम्हारी यादों के प्यासे उपवास में
चंद उतर आने तक घुटन इतनी बढ़ चुकी होगी
कि आँसू अंदर तक गला तर करने में
कामयाब हो ही जाएंगे ....
और इस तरह तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारी यादों कि दीर्घ आयू का ये व्रत ,
मैं पूरा कर पाऊँगी ॥

साल दर साल बढ़ते देखा चाँद का ये नटखटपन
आज जाने क्यों लगा खत्म हो गया हो!
तुम जब थे मेरे पास तो ये चाँद
तुम्हारे चाँद को इंतज़ार की अमावस्या में,
 दीदार की चाँदनी के लिए कितना तड़पता था,
.....  तुम पास बैठे मुझे निहारते  रहते,
  और आसमान में घूरकर नदारद चाँद पर गुस्सा करते।
मैं चाँद कि इस शरारत पर हंस देती ,
तो कभी तुम्हारी नाक पर रखे
उस गुस्से पर प्यार आता मुझे .... ॥

आज छत पर नहीं जा सकी ,
जलेबियों कि मिठास से भरी ...
वो हर साल बीती पिछली रात याद आ रही थी ।
पटाखों कि आवाज़ और ' जल्दी ऊपर आओ' का शोर ...
आज बेमानी लग रहे थे मुझे ।
फिर भी हिम्मत करके सीढ़ियाँ सीढ़ियाँ चढ़ी ...
तुम्हारी यादें अमर करने का व्रत ,
पूरा जो करना था मुझे ।
आवाक ! रह गयी देख कर......
कि चाँद आज इतनी जल्दी निकाल आया था!

चाँद का खत्म हो चुका वो नटखटपन
आज बहुत खला मुझे ।
आँसू कब भीतर तक तर कर गए गले को,
मैं जान ही न सकी ।
बस इतना लगा कि , ......
इतने सालों से जो तुम चाँद को घूर रहे थे,
ने आज वो बात सुन ली थी शायद।
.... या फिर जैसे ,
तुमने जिम्मा दे दिया हो उसे मेरा खयाल रखने का॥
             - शिवांगी ( 22-10-2013)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चौबीस के नतीजों तक ताप बनाए रख सकता है सतपाल मलिक का इंटरव्यू

US rental Housing : अमेरिकियों की हैसियत से बाहर हो गया किराया । Research Engine 12 (Bolte Panne)

तीसरी लहर की आहट दे रहे पूर्वोत्तर के सात राज्य