'नश्तर..'

सैफई में हमनें 'कुछ करोड़' खर्च क्या कर लिए ...मियाँ आप लोगों नें तो 'बवाल' ही मचा दिया। 'मुजफ्फर नगर ' न हो गया,'गले की हड्डी' हो गई..हम चुप रहें तो परेशानी कुछ बोल दें तो 'संवेदनहीनता'! अब कोई मुझे बता दें हमसे दंगें भड़क गए तो क्या ..राहत शिविर भी तो हमारी जेब से ही चल रहा है। अमां..मिया 'जो आया है उसे कभी तो जाना ही है ' न..।किसी को राहत शिविरों सें तो किसी को महलों से..। क्या 'गुस्ताखी' हो गई जो ये सच कह दिया हमारे एक नेता नें। राहत शिविर उखाड़नें का कारण भी 'गीता के इसी उपदेश' से लिया है हमनें। बैसे नेता से याद आया 'ड़ेढ़ ईश्कियां' के प्रीमियर शो पर न जानें का कारण 'मीडिया का हो हल्ला' नहीं हमारे 'नेता जी ' थे।बो क्या है न ..माधुरी जी का चंद्रमुखी और नसीरुद्दीन के तमाम किरदार 'समाजबाद' का ही एक 'चेहरा' हैं न ..और क्या है न हमारे 'नेताजी' नसीर साहब के बड़े फैन हैं..।...और मैं भी बस उन्हीं के लिए फिल्म देखनें की इच्छा रखता था:-P;-)। बस इसी 'पहले मैं-पहले मैं' में प्रीमियर निकल गया। हमनें 'बुलट राजा ' और 'ड़ेढ़ ईश्कियां' को एक एक करोण का अनुदान देनें की घोषणा क्या दी..इस मीडिया के सीनें में साँप लोट गए। काँग्रेस और राहुल की नीतियों से हम सहमत नहीं ,लेकिन हां सही कहा उन्होनें कि पब्लिक सिटी करना विरोधियों से सीखना चाहिए। काम तों मियां हमसे बेहतर किसी नें नही किए यू.पी. में...मगर लोग सिर्फ मुजफ्फरनगर याद रखतें हैं। लेकिन याद रखना 'मोदी जैसी' क्लीनचिट हम भी लेकर आएगें...।।;-)

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