"...ये जंग मैं लड़ता रहूँगा''

"...ये जंग मैं लड़ता रहूँगा!" इस देश में प्रेम के दुश्मन भले हो लोग, मगर कानून है इक चीज जो इंसाफ करती है। भले अब अपनों की नज़रो में हम,'शर्मिदगी' की चीज़ हो.. मगर वो पटटी नज़रो पर वांधे 'इंसाफ की देवी' , हमें तो आजभी अपनी ही 'पहरेदार' लगती है।। ऐ !इंसाफ की देवी तुझी से आस थी अंतिम, तो फिर क्यों नही सोचा तुनें ये फैसला करते... कि ग़र 'गुनाह' के दर्जे में रखा ये प्यार जाएगा, तो इस प्यार से जुड़ा जो अस्तित्व है मेरा.. उसकाभी तो खुद ही 'कत्लेआम' हो जाएगा!! 'समलैगिंकता' में भी वही 'आलौकिकता' है प्यार की। इस प्यार मेंभी 'दो जिस्म और इक जां' सा ही ज़ज्वा है, इस प्यार में भी साथ जीनें मरनें की ही कसमें हैं। इस प्यार में भी सपनें,है साथ का एहसास भी, इस प्यार से ही खुशिया मेरी,है मेरा ये संसार ही। फिर क्यों अलग छितरा हुआ सा कर दिया तुनें हमें, बांध धाराओ की गिरह में ,क्यो अपराध घोषित कर दिया तूनें इसे...।। मैं 'मुखालफत' करता हूँ तेरे इस 'बेतुके आदेश' की! आखिरी सांस तक लड़ता रहूगाँ, 'समलैंगिक प्यार' ग़र है पाप तो ये पाप मैं करता रहूँगा। अब तलक तो 'दुश्मन' मिरा ज़माना हुआ करता था ये, इस फेहरिस्त में अब, 'कानून' भी इक नाम ग़र है तो क्या... इसके खिलाफ भी 'अधिकारो के हनन' की ये जंग मैं लड़ता रहूँगा..। इसके खिलाफ अधिकारो के हनन की ये जंगमैं लड़ता रहूँगा।। 18/12/13 मेरी क़लम से... 'शिवांगी जायसवाल' (शीर्ष अदालत के व्यस्क संमलैंगिक प्रेम संम्बधों को धारा ३७७ के तहत 'अपराध' घोषित करनें के निराशाजनक फैसले के विरुद्ध चल रहे विरोधों को ..कुछ शब्द दे और मुखर करनें की मेरी कोशिश है। ..कविता पर विचार अवश्य रखें। ये मुद्दा सिर्फ संमलैगिंको के लिए ही नही है,वरन हर भारतीय को इस अन्याय के खिलाफ ज़ारी इस जंग में अपना योगदान देना चाहिए। महाशक्ति बननें का सपना बुनता भारत अपनी इस पाषाणकलीन सोच से बाहर आये...)

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