'भारतीय आतंकवाद' और 'भारतीय बर्बरता' !
'भारतीय आतंकवाद' और 'भारतीय बर्बरता' !
क्या यह शब्द आपने पहले सुने थे, यहां मुस्लिम या हिन्दु आतंकवाद की बात नहीं हो रही है.. विश्व समुदाय संगठन 'ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉर्पोरेशन' ने कहा है कि भारत प्रशासन जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद और बर्बरता मचा रहा है। यह बात दुनिया के 57 देशों के उस संगठन ने कही है, जिस संगठन को यूनाइटेड नेशंस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरगर्वनमेंटल ऑर्गनाइजेशन माना जाता है। पिछले सप्ताह अभिनंदन की वापसी के अगले ही दिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आबूधाबी पहुंचीं, ओआईसी समिट में बतौर विशिष्ठ अतिथि। भारत में माना गया कि जो काम पिछले 50 साल में नहीं हुआ, वह अब संभव हो सका , पाकिस्तान के विरोध के बावजूद आयोजक देश सऊदी अरब ने भारत को निमंत्रण भेजा, वह भी विशिष्ठ अतिथि के रूप में..,। इतनी बड़ी तादाद में मुस्लिम आबादी के भारत में रहने के बावजूद भी भारत को इस महत्वपूर्ण संगठन में सदस्य या ऑब्ज़र का तक स्थान नहीं मिल सका है। लेकिन पिछले वर्षों से उलट इस साल ओआईसी ने पाक को अनसुना करके भारत को बुलाया ।
सुषमा स्वराज के वहां पहुंचने और नाम लिए बिना पाक को आतंकवाद के लिए लताड़ने की कहानी अधिकांश लोगों ने सुन ली है। लेकिन उसके आगे की कहानी पर मीडिया में कम लिखा सुना गया है..।
सुषमा स्वराज के भाषण के अगले दिन यानी शनिवार को ओआईसी ने रेजलूशन पास किया, जो पूरी सभा द्वारा स्वीकृत है, लेकिन विशिष्ठ अतिथि भारत ने इसे अपने विरुद्ध होने के कारण अस्वीकृत कर दिया है। जाहिर है भारत के पास शर्मिंदगी से बचने के लिए इस प्रस्ताव को स्वीकार न करने के अतिरिक्त कोई विकल्प मौजूद नहीं रहा होगा, लेकिन क्या हम 'भारतीय आतंकवाद' टर्म से मुंह मोड़ सकते हैं? इस शब्द को सुनकर शर्म आती है, लेकिन क्या इसे बिना किसी बहस के आज खारिज किया जा सकता है?
आगे बढ़ने से पहले हम जान लें कि ओआईसी ने आबूधाबी घोषणा में क्या कहा है - 'जम्मू और कश्मीर राज्य में जुलाई 2016 के बाद से अवैध प्रतिबंध और लोगों के गायब होने की घटनाओं में भारतीय बर्बरता है और इसके लिए भारतीय प्रशासन की भूमिका की आलोचना की जाती है। इस घोषणापत्र में भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद समाधान के लिए जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का भी समर्थन किया गया है। साथ ही इस बात पर जोर दिया गया है कि यह दोनों देशों के बीच का मुख्य विवाद है। '
इस घोषणा पत्र को हम अपने-अपने नजरिए से देख सकते हैं क्योंकि यह मुस्लिम एकता वाले संगठन की ओर से आया है। लेकिन हम यह याद रखें कि इनमें वे मुस्लिम देश मुख्य भूमिका में हैं जो तेल बेचते हैं, जिनको भारत में एक बड़ा ग्राहक अब दिखने लगा है, इस कारण ही उसे निमंत्रण भी मिला।
पुलवामा के बाद हमारे देश के हालात बदले हुए से हैं, यह बदलाव कई साल से आ रहे थे जो 14 फरवरी की घटना के बाद एकाएक दिखने शुरू हुए। ठीक ऐसे ही कश्मीर में जुलाई, 2016 में कश्मीरी युवक बुरहान वानी का एनकाउंटर किए जाने के बाद हालात बदल गए हैं। वहां के लोग इन बदले हुए हालात को क्रांति शब्द से परिभाषित करते हैं, वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (जिसे पाक ने आजाद कश्मीर माना है और अब चीन इसे अपना प्रांत मानकर यहां विकास के नाम पर अधिकार कर रहा है।) की तरह खुद को 'आजाद कश्मीर' बनाना चाहते हैं।
कश्मीरी आज मानते हैं 'there is only one solution, gun solution...gun solution..gun solution', 'कश्मीर मांगे आजादी' जैसे नारे लगना वहां आम हो चला है। दुकानों के शटर पर 'go back india' जैसे नारे लिखी तस्वीरें इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। लेकिन इस सबको सुनकर खून खौलाने और उन्हें देशद्रोही मानने की जगह हमें विचार करना होगा कि आज विश्व समुदाय जिस भारत आतंकवाद की बात कह रहा है, वह बात कश्मीरी कई वर्षों से कहते आए हैं, लेकिन हमने उसपर विचार करने की जगह हमेशा उन्हें आइसोलेट करने की ही कोशिश की है। 'कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है' जैसे वाक्य स्कूलों में पढ़ाने, गीतों के जरिए शेषभारत में पहुंचाने और राजनैतिक मंचों पर कहने भर से काम नहीं चलेगा।
कोई भी छोटा समूह हमेशा कट्टरवादी होता है, संस्कृति, भाषा, पहनावा और खानपान के स्तर पर.. क्योंकि इन तरीकों के जरिए वह अपनी पहचान को कायम रखने की कोशिश करता है। दुनियाभर में जो भी दल, समुदाय, जाति, पंथ, धर्म के लोग कम संख्या में रह रहे हैं, वे वहां के बहुसंख्यक के मुकाबले खुद की पहचान के प्रति अधिक संवेनदशील होते हैं और इस कोशिश में खुद को आइसोलेट भी करते हैं। कश्मीरी भी आज अपनी पहचान के अस्तित्व में वह सब कर रहे हैं जिसे हम एक शब्द में ' आतंकवाद ' कह देते हैं, लेकिन इतना कहना भर वहां की स्थितियों का सही अध्ययन नहीं होगा। हमें उनके डर को खत्म करने की जरूरत है, वह डर हमारे राजनेता और अलगाववादियों ने पनपाया है। कश्मीरी अपने चारों ओर सेना, बंदूकों, मोटार, पैलट गन देखते हुए जीवन गुजार रहे हैं, उनकी परिस्थितियों को समझकर ही हम उनके डर और चुनौतियों का आकलन कर पाएंगे और कोई हल निकल सकेगा। वरना इस ' भारतीय बर्बरता ' और 'भारतीय आतंकवाद ' शब्द को आप और हम बार-बार सुनेंगे..
किसी एयर स्ट्राइक, किसी मसूद अजहर को मारने भर से आतंकवाद नहीं खत्म होगा, कश्मीर के हाल उस बुरहान बानी की हत्या के बाद ही बिगड़े हैं, जिसे युवाओं को भटकाने वाले आइकन के रूप में भारतीय प्रशासन देख रहा था। हाल ही में ट्रंप ने एक मिलियन डॉलर की इनामी रकम देने की घोषणा की है, यह रकम उसे दी जाएगी जो अलकायदा लीडर ओसामा बिन लादेन के बेटे हमजा को ढूंढ निकालेगा। यानी आप समझ सकते हैं कि लादेन को मारने से अमेरिका उस आतंकी संगठन को खत्म नहीं कर पाया। अंत में बापू के शब्द कि हिंसा किसी हिंसा का समाधान नहीं हो सकती।
- शिवांगी (6/03/2019)

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