time calls for feminist system

अखबार में किसी पैरा का अंतिम शब्द किसी नई पंक्ति में अकेला रह जाए तो उसे अंग्रेजी में 'विडो वर्ड ' कहते हैं। विडो यानी विधवा ... वो औरत जिसका आदमी चल बसा हो। किसी अखबार के पन्ने के किसी पैरे का अकेला लटका शब्द विधवा के समान किस तरह हो गया ?! ज़ाहिर है कि पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में यह शब्द पुरुषवादी मानसिकता से ही निकलकर शब्दावली का ' अभिन्न अंग ' बन गया होगा ... । इस कारण ही इस अकेले शब्द का नाम विडोअर वर्ड यानी विधुर शब्द नहीं है। ( उदाहरण के लिए इस तस्वीर में 'increases' शब्द को देख लें, एक अकेला लटका शब्द....।) 

इसे लिखते हुए याद आ रहा है कि प्रधानमंत्री ने कुछ दिन पहले सोनिया गांधी को विधवा कहा था। कहा था - गरीबों के रुपए कौन सी विधवा खा गई । उस पर कुछ मीडिया संस्थानों ने आलोचना की, जो कि ज़रूरी था। लेकिन मेरा कहना यह है कि यह क्षेत्र खुद पूरी तरह पितृसत्ता को ढोह रहा है, बीट ( रिपोर्टर का कार्य क्षेत्र / विभाग) के बंटवारे की बात हो, महिला पत्रकारों की सैलरी की या फिर ऐसी शब्दावली की। अब चैनलों पर हो रही चीख पुकार, मार पीट, हिंसक भाषा, युद्ध के उदघोष और महिला एंकरों के हावभाव और संवाद के अंदाज़ भी इस व्यवस्था की झलक देते हैं।
पितृ सत्तात्मक व्यवस्था हिंसक है, हिंसा और युद्ध का समर्थन करती है, अकेली औरत के अस्तित्व को नहीं मानती या बेचारा कहती है जो कई बार खबरों में भी झलकता है। चर्चित महिला एंकरों के हावभाव लगभग मर्द एंकर की तरह गुस्से और अजीब तरह के बदला लेने जैसे भावों से भरे दिखते हैं, यह पूरी व्यवस्था का असर है, या कह लीजिए कि इस ' स्टाइल ' / पैटर्न को अपनाना उनकी मजबूरी है। औरत होने के कारण टीवी पर खूबसूरत और मॉडलनुमा दिखना इन न्यूज एंकर की एक आवश्यकता है, जो टीआरपी/ बाजारवाद और औरत को किसी वस्तु के रूप में देखने की मानसिकता का परिणाम है, जो कि देखकर आसानी से समझी जा सकती है। लेकिन उनके कहने का अंदाज़ भी शायद उनकी आवश्यकता का अंग बन गया है, जो कि पूरी तरह पुरुष एंकरों जैसा होता है। शायद एंकरिंग वाले पुरुष प्रधान काम के तरीके को अब मानक माना जाता हो ... इसलिए लगभग सभी महिला न्यूज एंकर उसी मानक पर चलते हुए बोलती दिखती हैं, जिसमें उनके स्वभाव की झलक नहीं होती।
पर्यावरण नारीवाद कहता है कि महिलाएं प्रकृति के करीब इसलिए हैं क्योंकि वे खुद श्रृजन करती हैं, प्रकृति की तरह। प्रकृति के गुण हैं - प्रेम, सौम्यता, अहिंसा, मृदुभाष ... । महिलाएं सामाजिक सत्ता की भोगी नहीं होती, इसलिए वे होती है अपने मूल भाव में... जो पुरुष सत्ता के भोगी नहीं होते, वे भी होते हैं अपने मूल भाव / स्वभाव में। आज पूरी दुनिया में जो गुस्सा दूसरी अल्पसंख्यक कौमों के लिए जहर फैला है, वह सत्ता के भोगी और सत्ता बचाए रखने के लिए कुछ भी करने को उतारू पुरुषों की वजह से है। औरतें कभी जंग नहीं चाहतीं, हालांकि यह भी सच है कि इन मामलों में कभी उनका पक्ष पूछा नहीं जाता, बस मान लिया जाता है कि अपने लाल को सीमा पर भेजने में उन्हें गर्व होगा! युद्ध में पति को खोने वाली युद्ध विधवाएं भी बेचारी ही होती हैं, पर उन्हें राष्ट्रप्रेम की ओढ़नी से ढक दिया जाता है। पिछले सप्ताह के अनुभव याद करें।
ऐसे हालात के बीच आंग सांग सू जैसी महिलाएं भी हैं, जो अपने जीवन का लंबा हिस्सा हाउस अरेस्ट में गुजारने के बाद जब म्यामार की सत्ता संभाली हैं तो रोहिंगियों पर हर संभव हैवानियत करती हैं, उनसे शांति पुरस्कार छीन लिया जाता है, हर किसी का विश्वास उठ जाता है दोगलेपन को देखकर। ऐसा ही उदाहरण हम भोग चुके हैं, आयरन लेडी ... यानी औरत के भेष में वही पुरूषसत्ता ... इंदिरा गांधी। जब सत्ता जाने का डर दिखा तो लगा दिया अपातकाल, उनकी हत्या के बाद उनके नाम पर सत्ता हथियाने के लिए किया गया नर संहार , जिसे हम मात्र सिख दंगा कहते हैं। तो क्या मान लिया जाए कि औरतें सत्ता पाकर ऐसा ही करेंगी, उनके आरक्षण पर बात नहीं होनी चाहिए , बिना पुरुष के साए के जी रहीं विधवाएं बेचारी ही मानी जानी चाहिए ?? जवाब है कि नहीं , क्योंंकि ये दोनों उदाहरण उस निरंकुशता को ही दिखाते हैं जो नरेंद्र मोदी ने गुजरात में कराई... वह भी नर संहार था। यह हिंसा पुरुषवादी मानसिकता का परिणाम है।
इस सोच से महिलाएं भी ग्रस्त हो सकती हैं, वे पुरुषों पर अत्याचार कर सकती हैं, अपनी कौम यानी औरतों की दुश्मन मानी जा सकती हैं .... पुरुष नारीवादी हो सकते हैं, महिला हिंसा पर उठ खड़े हो सकते हैं, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खिलाफ हो सकते हैं, ..... क्योंंकि यह लड़ाई किसी मर्द या किसी औरत के खिलाफ नहीं है, यह लड़ाई मर्दवादी व्यवस्था के खिलाफ है। ऐसी व्यवस्था जिसे तमाम धर्मों के बल चलाया जा रहा है, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई .... यह सूची लंबी है। यह व्यवस्था औरतों को अन्या बना देती है... घर उनकी प्रार्थमिक जिम्मेदारी होता है, बच्चे पालना उनका धर्म होता है ... धर्म के विरोध में सुनना उन्हें अपने विरोध की आवाज़ लगता है... यह पूरा व्यवहार इस व्यवस्था के जाल के कारण है।
सोचिए इस व्यवस्था से उपजी हिंसा और भेदभाव को बताने के लिए बनाई हुई पत्रकारिता में अगर पुरुषवादी लोग बैठे होंगे तो आप तक क्या पहुंचेगा ?? विडो वर्ड जिसे मैं सिंगल वर्ड कहती हूं, यह तो मात्र एक उदाहरण भर है .... नारीवाद किसी औरत को सत्ता देने की बात नहीं करता, यह किसी की भूमिकाओं को बांटता नहीं है,यह सभी को बराबर देखता और देता है, योगदान करता और योगदान चाहता है ... ठीक प्रकृति की तरह । 😊
शिवांगी (5 march 2019)

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