शहर होते हैं सभी एक से ही ...!




                                                


वही दफ्तर  , वही  बाबू  

 वही रंग-रोगन दीवारों पर 'पान की पीकों' का ॥ 

वही तेवर , सफारी सूटों से बाहर 'झाँकती' वैसी ही तोंदे,

'कल आना' वाला वही पुराना जुमला भी ,,

फिर एक चाय की 'मनुहार', और कुछ 'हरी पत्ती' ...

अच्छा इसलिए ही,

शहर होते हैं सभी एक से ही ... !

   

कुछ वैसे ही चौराहे 

और बीचों बीच लगी 'महापुरुषों' की मूर्तियाँ भी  वैसी ही । 

 ट्रेफिक पुलिस को 'धता' बता ...

'धड़ल्ले' से निकलती वैसी ही गाडियाँ भी। 

पीं-पीं की आवाजे और धक्कमपेल के बाद होते 'वही बवाल',

मन में अब आता अब एक सवाल...

क्यों ,

शहर होते हैं  सभी एक से ही ...?

 

   कुत्ते बकरी और लोगों के,

 चहलकदमी की एक ही वही जगह। 

नव-युगलों के मिलन का बस वही है सरलतम स्थान भी। 

पुलिस वालों की 'डंडा-पिटाई' ,

कौन है ये तुम्हारा......... 'भाई' ? 

'अभिव्यक्ति की आज़ादी' का 'तमाशा' देखते,

 वैसे ही ये पार्क भी ...। 

 आह! सच में,

शहर होते हैं सभी एक से ही ...!

 

'अनाथालय', 'नारीनिकेतन' और 'लाल-बत्ती रस्तों' का ,

होता है 'पता' लगभग 'एक सा' ही...!

एक से ही कालोनियों के नाम भी ,

और उन्हीं में अपने-अपने घरों की रस्सियों पर, 

कपड़े सुखातीं 'एक सी' ही दिखती

वो सारी 'गृहस्थने' भी...। 

'सुरक्षित' रहने का आसान उपाय - 'चेहरे पर मुरैठा'

बांध , गुजरती लड़कियां भी ठीक वैसी ही ...

इसलिए भी,

शहर होते हैं सभी एक से ही ...!

 

  अखबार भी तो बस 'भरे' मिलते हैं , 

बलात्कार, हत्या या फिर नगर-निगम 

और प्रशासनिक खबरों के ठीक 'वैसे ही कालमों' से ॥ 

  ...और शायद इसीलिए ही ये 'पत्रकार',

 चला पातें हैं ...किसी भी शहर में ,

 'खबरों' का अपना 'कारोबार'।

क्योकि,

शहर होते हैं सभी एक से ही ...!

                                         -

                                    शिवांगी      

 

   
 
















































































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