कमर की झिल्ली...




suraksha.... pta nahin wo bachchi is sparsh ko ab kabhi mehsus bhi kar payegi
एक और केस है वलात्कार का..., चलों मिल लो।
 घर पहुंचनें पर हड़वड़ाहट के साथ अभी-अभी सोई नींद से जगी वो ,
.... सामनें दिखीं अपनी वही दीदी और एक नयी सी लड़की ।

हाल-चाल के दौर में छिड़ी बात 'दो साल पहले' के एक दोपहर की...।
' ६ साल की थी तब, अब तो दीदी सबके पास जानें लगै है...,
स्कूल भी जाबै, नाम लिख लेत है, हमारौ भी... अब ठीक है।अबही मिलवात है...।'
 पैप्सी की दो बोतले और कुछ पकौड़ियों से भरी एक पन्नी...,
...' जे है वो लल्ली'।

,,... इधर आओ मेरे पास... ,
 सुनते ही चिपक गई  वो अब अपनी अम्मी से।
'जे भी स्कूल की मेडम की तरह उगाहड़ेगीं मेरी फ्राक...!'
... उसने बस सोचा सहमे सहमे...,
लेकिन अम्मी समझ गई और वो दीदी भी...।
 लेकिन ये 'नसमझ- कमअक्ल' नई सी लड़की
 नही समझी 'कमर की उस झिल्ली' को...।

उसने वुलाया पास,... लगाया गले,... चूमां पसीनें से भीगा उसका गाल
...और पकौड़ी के कुछ टुकडों को चवाते-चवाते धीमें से 'उठा दी फ्राक'... ।
 'कमर की वो झिल्ली'...कोई मांस का टुकड़ा नही,
.... था उस 'वलात्कार' के बाद 'मल त्याग' का एक 'क्रतिम रास्ता'।
'कोशिश' नही 'वलात्कार' था जो खत्म कर गया, बच्ची का 'निचला हिस्सा'।
......
 अब बस पड़ी है पकौड़ियों की महकें बोतलों की आवाजें।
         - शिवांगी 14/08/14

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