देखता हूँ अभी ......

'एक औरत है चौराहे पर ,, रो रही है फिरती लावारिस पाँच दिन से '
मैंने कहा ,,, बोला अखबार 'देखता हूँ अभी' ,
और फिर बोला 'किसी और' को भी ,,,
"नारी निकेतन है एक रास्ता अगर नहीं है कोई 'अपना' उसका" ,, 'उसने' कहा
और आयी साथ मेरे ॥
डरी सहमी 'वो' रोते हुए बता रही थी अपनी 'कहानी' I
'बोली' समझ पाना हो रहा था मुश्किल,,,
 'किसी और देस की है',,, कहा दिमाग ने।
मगर औरते 'अपने और दूसरे' मर्दो से झेलने के बाद 'मर्दगिनी' ,,,
 रोते हुए दिखती है एक सी ही न,,
सो पहुचाया उसे पुलिस के पास ...॥
' भाषाविद' नहीं हैं हम मैडम, कहाँ की है ...हम कैसे करे पता?
 ... उन्होने कहा॥
... फिर एक लंबी बहस
और तैयार हुए वो पहुंचाने उसे उसके घर,,,,॥
खुदका , बच्चे, नन्द, देवर, सबका नाम है पता ... लेकिन आदमी
????
 वो तो हैं न 'लल्ला का पापा' ...!
पति का नाम होता है क्या ... 'उनके'- 'इनके'... कहके ही कट जाती  है ज़िंदगियाँ!
...अब कोतवाली में है 'वो' ... ,
इंतज़ार में की कब पहुंचेगी 'लल्ला के पापा पास'॥
,,, 

,,,, और अखबार का 'देखता हूँ  अभी ' .. नहीं हुआ अब तक .....!!
                                            - शिवांगी (aug.2014)

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