माता और मम्मी ...

28 अप्रैल को माता की मौत हो गई। वैसे तो हम सब मौसेरे बहन-भाइयों को माता को नानी कहना चाहिए। पर माता तो जैसे जगत माता थीं। मम्मी-मौसी-मामा ही नहीं, अगली पीढ़ी भी उन्हें यही बुलाने लगी। इतना ही नहीं रिश्तेदार और मोहल्ले वाले भी उन्हें माता कहते। नाना के लिए वह ‘बेबी माता’ थीं। फालिज के कारण बेचारी दो साल तक बिस्तर पर रहीं। जब अंतिम यात्रा के लिए उन्हें तैयार किया जा रहा था तो उनके अकड़े शरीर से कपड़े उतारने के लिए उन्हें सिर के बल उठाया गया। तब पीठ पर जगह-जगह पट्टियों से ढके जख्म देखकर हर कोई सिहर गया। उनके शरीर में पड़ी यूरिन नली निकालने के लिए जब उसे हल्के से मैंने खींचा तो पानी की एक तेज धार निकल पड़ी जो ये शरीर में पैदा हो चुके बैक्टीरिया थे। यह देखना बहुत दर्दनाक था।
   74 साल की उम्र में वह चली गईं, नाना की मौत के ठीक आठ साल बाद। ये आठ साल कैसे कटे होंगे, यह उनके चेहरे से पता चलता था। जाहिर है कि जीवनसाथी का जाना किसी घर में एक इंसान के कम हो जाना भर नहीं होता। उसके लिए तो यह बिछोह शायद ज्यादा कठिन होता होगा, जिसने अपना बचपन, जवानी और बुढ़ापा साथ गुजारा हो। 14 साल की उम्र में माता की नाना से शादी हो गई। शादी के एक-दो साल में ही उनके ससुर गुजर गए। नाना सब भाई बहनों में बड़े थे, तो 14 साल की माता भी छोटे देवर-नंदों की मां जैसी ही हो गईं। फिर अपने भी सात बच्चों की जिम्मेदारी। सबकी शादियां करते-करते ही जीवन बीतता गया। पांच बेटियों वाली माता को इस बात पर ताने सुनने पड़े होंगे या नहीं, मुझे नहीं मालूम। पर आखिरी समय तक उनकी बेटियां ही उनकी हिम्मत बनी रहीं। मम्मी बिलखते हुए मेरे भाई से कह रही थीं कि जब दो लड़कियों के बाद तीसरी डिलीवरी के लिए उनके साथ घर से कोई अस्पताल नहीं गया तो माता ने ही कई दिन सेवा की थी।
बेबी, गुड्डी जैसे प्यार के नामों वाली ये बेटियां रो रही थीं। सबसे छोटी मौसी ने अपनी सबसे बड़ी बहन से पूछा- 'जीजी अब तुमसे बेबी कहने वाला कोई नहीं बचा, अब तुम ही बड़ी   
रह गईं।' साथ ही, ये अनाथ लड़कियां अपने भगवान का शुक्रिया भी अदा कर रही थीं कि माता तर गईं।
मैं नाना की मौत के बाद माता की मौत पर नानी घर गई थी। ‘नानी घर’ . . . मम्मी, मौसी, मामा अनाथ हुए और नानी घर खत्म हो गया। अब वह मामा का घर कहा जाएगा।  जब हम सब छोटे थे तो साल में कम से कम दो बार तो जाते ही थे नानी घर। बड़े हुए तो प्राथमिकताओं और व्यस्तता में वह घर छूट गया। अभी हाल ही में पढ़ते-पढ़ते मैंने महसूस किया कि नानी के घर के प्रति हमारा रवैया भी तो असल में पिता के परिवार को ही महत्वपूर्ण मानने के सामाजिक व्यवहार का नतीजा है, जो जाने अनजाने हमारे व्यवहार में है। नानी की मौत की खबर सुनकर मुझे रोना नहीं आया था, अम्मा की मौत पर बहुत रोई थी जबकि तब छोटी थी। ...जब तक ये अहसास हो पाया, वह ‘नानी घर’ ही खत्म हो गया। एक समय मेरा भाई मम्मी को गुड्डी कहकर चिढ़ाता था, पर अब इस नाम के मायने भी उनके लिए कहां वैसे रह गए होंगे। उस दिन के बाद से मैं खुद को मम्मी के प्रति ज्यादा जिम्मेदार महसूस कर रही हूं।

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