बाप का मारना ....
कई घरों में माँ भी मरती है
बच्चे तब भी अनाथ होते हैं ।
लेकिन बेटी संभाल लेती है ज़िम्मेदारी
पढ़ाई छोड़ कर गेहूं बीनने से आचार डालने तक
गृहस्थी में माहिर हो जाती है खुद ब खुद ।
भाई और बाप को खलता है
बस उसकी शादी के बाद।
पर कुछ समय में एक और लड़की
बहू बनकर गृह प्रवेश कर जाती है उनके जीवन में ।
बाप को कभी नहीं दिखना पड़ता शक्ल से विधुर ।
पर जब बाप मरते हैं घरों में ,
बेरंग जीवन की सफेदी माँ से
लिपट जाती है उम्र भर के लिए ।
लड़कियां इस बार भी कैद झेलने को होतीं है बेबस ।
जल्दी शादी और मोटे दहेज की चिंता में ,
स्कूल की फीस कहाँ निकल पाती है
भाई की कमाई में ......... ॥
माओं को कब दिया होता है हुनर ,
उनके बाप ने रुपये कमाने का ।
बिना जेब के कपड़ों का कारण
माएँ कहाँ समझ पाएँगी कभी ।
आदमी के सिधरते ही बेटे के सर मढ़ना होगा उन्हें ।
बेटे के लिए इसलिए ही बोझ हो जाती है
माँ और बहन .......
उसका बचपन भी तो छिनता है अचानक ही ,
बाप मरते ही छोड़ जाता है जिम्मेदारियों का पहाड़ ।
पित्रासत्ता नोच देती है खुद लड़के का ही जीवन ।
अगर बेटियाँ पढ़ें ... कमाई का हुनर सीखें ,
तो बाप का मारना त्रासदी न बने ,
माँ , बेटी और बेटे के जीवन के लिए ... ।
- शिवांगी 16-11-15
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